Thursday, 11 December 2008

लाइन लाइफ से गुजरती लाइफ लाइन ......


वो अक्सर जल्दी में होती है, यह उसका लंच टाइम था उसे आधे घंटे में कई काम करने थे। केमिस्ट से दवाई लेनी थी, बैंक में सेविंग से करंट अकाउंट में पैसे ट्रान्सफर करने थे, पोस्ट ऑफिस से पासपोर्ट फार्म लेना था और सुपर मार्केट से पास्ता सॉस और डबल रोटी लेनी थी। लंच टाइम में अक्सर काफ़ी शॉप हो या डेंटिस्ट का रिसेप्शन हर जगह लाइन होती है मोबाइल हो जाने से सिर्फ़ एक जगह लाइन गायब हुई है वो है टेलीफोन बूथ, वो अब एडल्ट चेट लाइन के पोस्टर लगाने के काम आते हैं या फ़िर उनमें प्रेमी पनाह लेते हैं। वैसे आम आदमी अपने जीवन के कम से कम दो- तीन साल लाइन में इंतज़ार करते निकालता है चाहे वो एअरपोर्ट पर चेक इन की लाइन हो या आफिस की लिफ्ट नीचे आने की। हाँ इसमें ट्राफिक की लाइन शामिल नही है वरना तो चार-पाँच वर्ष की लाइन लाइफ होना बड़ी बात नही है। वह दस मिनट पहले निकली कम से कम एक लाइन से तो बच जाए। वो बूट्स में घुसी ब्यूटी प्रोडक्ट के आफर पर नज़र मारे बिना फार्मेसी की तरफ़ बढ़ गई। लाइन में चार लोग थे। वह अपने नम्बर का इंतज़ार करने लगी। हर आईल में लोग भरे हुए थे मेकप और सेंडविच वाली आइल में सबसे अधिक भीड़ थी। जाहिर है मेकप की तरफ़ औरतें और सेंडविच की तरफ़ आदमी ज्यादा थे... अभी तो अक्तूबर का अंत ही है और भीड़ कितनी बढ़ गई है, क्रिसमस तक यह भीड़ बढती ही रहेगी। फार्मेसी के आलावा हर टिल पर लंबी कतारें होंगी...कल शाम को मीटिंग है घर पहुचने में देर हो जायगी, वह सुपरमार्केट से सब्जी भी उठा लेगी, वह सुपर मार्किट के टिल पर लाइन का अंदाजा लगाने लगी ...

उसका नम्बर आ गया तभी उसने अपने पीछे किसी को महसूस किया, उसकी बाजू को हल्का सा धक्का लगा और साथ ही नाक में बदबू का झोंका आया, उसके बाल बिखरे हुए थे जैसे वो अभी सो कर उठा हो, उसके गालों के गढ़े उसकी असली उमर से कहीं अधिक बता रहे थे, उसकी ट्रेक बोटम घुटनों से घीसी थी और सफेद रग़ से अब स्लेटी हो चली थी। उसने हलके रंग की टी शर्ट पहनी हुई थी जिसमें से उसकी पसलियाँ साफ़ दीख रही थी .... इससे पहले की वह लाइन में पहले होने का दावा करती...

मेथाडॉन! मेथाडॉन! काउंटर के उस तरफ़ खड़े सफेद कोट पहने व्यक्ति पर वह चिल्लाया।

"आर यू टूगेदर?" सफेद कोट वाले आदमी ने उन दोनों पर नज़र डालते हुए पूछा?

उसने उसकी तरफ़ सर घुमाया, ऊपर से नाचे तक निगाह डाली, नीली आखों में परिचित उपेक्षा चमकी जो सिर्फ़ कत्थई आखों को नजर आई।

"सर्टेनली नॉट"....वो मुह बिचका, माथे में सिलवटें डाल, ऊँची आवाज़ में बोला और गुस्से से सफेद कोट पहने व्यक्ति की तरफ़ देखा.... वो अब उसकी मेथाडॉन कंप्युटर को फीड कर रहा था ...कुछ क्षण को उसका असर उसे अपने भीतर महसूस हुआ ... जैसे हजारों निगाहें उस पर अंगुली उठा रही हों।

वह पीछे मुडी, उसकी आखें पीछे वाले से टकराई वह सर हिला रहा था... होंठो पर फीकी सी हँसी ला वह अपने नम्बर का इंतज़ार करने लगी...

8 comments:

savita verma said...

dilchasp

डॉ .अनुराग said...

वाकई दिलचस्प !

Meenu khare said...

बहुत ही मार्मिक. बहुत अच्छा लिखती हैं आप ...
मेरा मन उदास हो गया ...

dr. ashok priyaranjan said...

िजंदगी को आपने बडे मामिॆक तरीके से शब्दबद्ध किया है । अच्छा िलखा है आपने । मैने अपने ब्लाग पर एक लेख िलखा है-आत्मिवश्वास के सहारे जीतें िजंदगी की जंग-समय हो तो पढें और प्रितिक्रया भी दें-

http://www.ashokvichar.blogspot.com

ambrish kumar said...

aur aage badhaye.yeh kahani ban rahi hai.

शिवराज गूजर. said...

dil chho lene wali rachana.
badhai.
mere blog (meridayari.blogspot.com)par bhi visit karen.

Amit said...

bahut he accha likha hai...dil ko chu gayi...

bahadur patel said...

bahut achchha hai.