Wednesday, 14 January 2009

मुझे मुक्त कर दो...



भीतर की औरत

ने पत्नी से पूछा

तुझे क्या मिला?


पति का प्यार,

ड्राइंग रूम की दीवार

पर सजा फेमली फोटोग्राफ,

ग्रीन बेल्ट को छूता

ड्रीम हाउस ,

सड़क नापने को कार,

परिचितों, अपरिचितों का

इर्ष्या भाव,



जब तुम तुम थी

आसमा, सागर पलकों में बसते,

आइना तुम्हे

दिन-रात पढ़ता,

दिल और आत्मा को

आंखों की नज़र करता,


पकड़ती हो साइड मिरर में

भागती उम्र की रफ़्तार,

होती है लाल बत्ती पर

फुर्सत से आँखे चार,



अस्तित्व मिटा

इच्छाएं क़तर

दोष मुक्त हो

पत्नी से परफेक्ट बनी,

भीतर की अग्नि

आंसुओं से भी न बुझी,


अगले क्षण क्या करना है

का सॉफ्टवेयर तुम्हारे

हाथ-पाँव में फिट है,


आत्मा को ट्रेश

दिल और दिमाग में


उसे डाउन लोड कर लो,

ममता, मंगलसुत्र,

ग्लास सीलिंग चटखने की धुन में


तर लो,

मुझे मुक्त कर दो...


फोटो - गूगल सर्च इंजन से

8 comments:

Kishore Choudhary said...

बहुत ही सुंदर कविता , मन को उद्वेलित करती , स्वयं का आह्वान करती और मेरी तरफ़ कई प्रश्न उछालती हूई

डॉ .अनुराग said...

बेमिसाल ....कहूँ तो इस वेदना का अपमान होगा .....लेकिन कई मन को स्वर दिए है ऐसा महसूस हुआ .

pritima vats said...

बहुत अच्छी कविता है। मन इतना बेचैन हो गया है कि कुछ कहते नहीं बन रहा है।

creativekona said...

Neera ji,
Bahut achchhee tulna kee hai apne ek aurat aur patnee kee.sabse sundar panktiyan to ye hain....astitva mita ichchhayen katar doshmukta ho patnee se parfect banee...
achchhe shilp valee kavita ke liye badhai.
Hemant Kumar

bhoothnath(नहीं भाई राजीव थेपडा) said...

मुक्ति की कामना और बंधन से मोह,
सुलझने की तमन्ना और ऊहापोह की फितरत.......
पैर टिकाये रखने का प्रयत्न और फिसलन का भय.....
मानव के स्वभाव के भीतर क्या है...??
सरल-सा शब्द "मन"और इसकी जटिल सरंचना,
सुलगता हुआ दिल और इसे ठंडा रखने की कवायद.....
उड़ने को बेचैन आत्मा...और मरने से खौफ....
ये सब क्या है...??
आदमी बाहर से दिखता तो कैसा है.....!!
और इसके भीतर क्या है....??
.........अल्लाह रे कुछ तो बता,ये माजरा क्या है....!!

Harkirat Haqeer said...

Neera ji bhot accha likhti hain aap...bhot acchi rachna....bhot gahre bhav....BDHAI....!

Bahadur Patel said...

bahut badhiya likha hai aapane.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

नीरा जी
हम यहाँ ग्वालियर से एक बुलेटिन निकालते हैं - युवा दखल। इसका अगला अन्क है 'दुनिया मे औरत' पर केन्द्रित्।
आप अनुमति दें तो यह कविता हम उसमे प्रकाशित करना चाहेंगे ।
भीतर की औरत के ये सवाल इस दुनिया के मर्दों से भी हैं - खासकर उनसे जो घर के बाहर की दुनिया बदलने का दावा करते हैं । अभी तो मै ख़ुद से पूछूँगा फिर हिम्मत हुई तो दूसरों से भी…