Thursday, 17 September 2009

उनकी नीली आँखों में अनगिनत किरणों की रौशनी....



समुद्र कि लहरें उनके पाँव को चारों तरफ से चूमती हैं..उनकी घुटनों तक मुडी जींस को छू कर लौट जाती हैं उन्हें दोबारा भिगोने के लिए ... समुद्र ने सूरज को अपने भीतर छुपाने से पहले हाथों में ऊपर उठा रखा है ताकि सब उसे गौर से देख लें...आज की तारीख का सूरज देखने का यह आखरी मौका है... उसका रंग पीले से नारंगी हो चला है .. पर्यटक अपनी चटाई, तौलिये, फ्लास्क, छतरी, सेंडविच बॉक्स समेट रहे हैं ... घोड़ेवाला बच्चों को घोड़े पर आखरी सवारी दे रहा है ... आइसक्रीम वाले के पास अब सिर्फ वेनीला और मिंट फ्लेवर की आइसक्रीम बची है, तट पर चार पांच साल का लड़का रेत का महल पेरों तले रोंद कर खुश हो रहा है और उसकी बड़ी बहन उसकी दीवारें और छत बचाने कि कोशिश में उसे धक्का दे रही है.... उनकी माँ चिल्ला रही है उसे रोंद लेने दो वैसे भी लहरें बहा ले जायेंगी यह महल... तट पर हलचल कम होने लगी है तो सामने सड़क पर बढ़ गई है और सड़क के उस पार दुकानों पर दिवाली जैसी जगमगाहट है ... 
 

रेचल पहली बार अपने गाँव से बाहर निकली है उसका गाँव यहाँ से अस्सी किलोमीटर कि दूरी पर है, इससे पहले उसने चहल- पहल गाँव में हर रविवार लगने वाले बाज़ार में देखी है यहाँ पहली बार उसने समुद्र और शहर कि जगमगाहट देखी है गाँव में एक ही बेकरी है रेचल उसमें काम करती है जहाँ पर हर रोज राबर्ट लंच टाइम में सेंडविच और केक खर्रेदने आता था ... रॉबर्ट गाँव से बाहर एक ऊन की फेक्ट्री बन रही है उसमें क्रेन चलाने का काम करता है उसे पढाई छोड़ देनी पड़ी क्योंकि सोलह वर्ष के होते ही उसके पिता ने खर्चा देने से इनकार कर दिया ...


रेचल को जो भी सीपी नज़र आती है वो उठा लेती है और उसे रॉबर्ट कि कमीज़ की जेब में डाल देती है... उसके क़दमों के साथ सीपियाँ छनक रही हैं पार्श्व में लहरों का संगीत सातवें स्वर में उनका साथ दे रहा है ढेर सारा जीवन बिखरा पड़ा है गिले रेत पर पाँव के निशाँ में, लहरों में उबलते बुलबुलों में, हवा के साथ डोलते जहाजों में, नीले पानी में घुलती किरणों कि लाली में, आकाश में उड़ते परिंदों कि कतारों में, सड़क पर झिलमिलाती रौशनी में, केफे से उड़ती मछली कि महक में, एमुज्मेंट की मशीनों से आते शोर में .... वे समेट रहे हैं यह जीवन रेत में पड़ी सीपियों के साथ अपने ख़्वाबों में ....


दोनों थक कर बेंच पर बैठ जाते हैं .... रेचल का गुलाबी रंग नारंगी रौशनी में चमक रहा है दोनों की नीली आँखे डूबते सूरज की अनगिनत किरणों को सोख रही हैं .... रेचल ने अपना सर रॉबर्ट के कन्धों पर टिका लिया है दोनों की उम्र उनीस वर्ष है यह उनके हनीमून का आखरी दिन है... उनकी आँखों में वो सभी ख्वाब दस्तक दे रहे हैं जो प्यार के समुद्र में गोता लगाने आसमान से उतर कर आते हैं फिर नींद में बस जाते हैं ... उन्होंने फैसला किया है उनके कुछ ख्वाब नींद से ज़मीन पर उतरेंगे ... वह शादी कि पच्चीसवी सालगिरह यहीं मनाएंगे इसी तट पर, इसी बेंच पर, यहीं सूरज के सामने ... वह दो बच्चे अगले दो वर्ष में पैदा करेंगे...उन्हे एक साथ पाल-पोस कर बड़ा कर... वह रेचल का दुनिया घुमने का सपना पूरा करेगा ... वहां से लौट कर वह यूनिवेर्सिटी में दाखला लेगा और डिग्री की पढ़ाई पूरी करेगा ....



आज वो दोबारा से उसी बेंच पर बैठे हैं राबर्ट के माथे के ऊपर से सर से कुछ बाल उड़ गए हैं और रेचल के बाल कुछ ज्यादा सुनहरे हो गए हैं एक वर्ष पहले उनका तेईस वर्षीय बेटा माइकल इराक़ कि लड़ाई में मारा गया.. वह पेट्रोल से भरी लारी चला रहा था जिस पर किसी ने हेंड ग्रेनेड फेंक दिया...बेटे कि जगह उन्हे सरकार से कुछ पैसे, उसका सूटकेस और उसके दोस्तों से आखिर के दिनों में खींचे फोटो मिले ... उसकी गर्भवती पत्नी एलिक्स को गहरा सदमा लगा छ महीने  बाद बेटे के जन्म के समय उसे ब्रेन हेमरेज हो गया.... उनकी बेटी लिज़ जो माइकल से एक साल बड़ी है बचपन में दादा के फार्म पर जाकर रहा करती, उसके दादा ने उसका यौन शोषण किया, उस दर्द से छुटकारा पाने के लिए उसने हिरोइन का सहारा लिया, जब वो माँ बनी उसे बच्ची के पिता का नाम तक ना मालुम था... अपनी बच्ची को वह बहुत प्यार करती थी .. अपने आप को काबिल माँ बनाने के लिए वह एक वर्ष रिहाब में रही....फिर भी सोशल सर्विस ने बेटी को चिल्ड्रेन होम से माँ के पास नहीं लौटने दिया .. लिज़ वर्तमान से दूर भागने के लिए फिर से जाने- पहचाने पुराने रास्तों की तरह मुड़ ली ... राबर्ट और रेचल को नातिन की कस्टडी के लिए कोर्ट में केस करना पड़ा जिसे वह दो साल बाद जीत गए....



आज भी चारों तरह बहुत सारा जीवन बिखरा पड़ा है राबर्ट कि गोदी में एक जीवन आँखे मूंदे दाये हाथ का अंगूठा चूस रहा है और दुसरा जीवन रेचल और रॉबर्ट के बीच बैठा बाये हाथ की अंगुली उठा -उठा कर मुश्किल से मुश्किल सवाल पूछ रहा है जिसका वो बारी - बारी मुस्कुरा कर जवाब दे रहे हैं ... आज भी समुन्द्र उनके पेरों को चूम रहा है, सूरज को उसने हाथों में उठा रखा है ... राबर्ट के हाथ रेचल के कंधे पर है उनके सपने भले ही फिर से पचीस साल के लिए सूरज के साथ समुद्र में छिप गए हैं किन्तु पचीस साल पहले किया सूरज और समुद्र से इस बेंच पर मिलने का वादा उन्होंने निभाया है... आज भी उनकी नीली आँखों में अनगिनत किरणों की रौशनी है जो उन्होंने दशकों पहले सोखी थी .. 
 
फोटो - गूगल सर्च इंजन से

22 comments:

M VERMA said...

मार्मिक और प्रवाहमयी रचना.
कहने का अन्दाज खूबसूरत

Udan Tashtari said...

बढ़िया कहानी.

हेमन्त कुमार said...

गहरी भावपूर्ण अभिव्यक्ति । आभार ।

Kishore Choudhary said...

ज़िन्दगी के इतना करीब कि साँसें सुनी जासकती है इस किस्से की...
क्यों रेत पर पाँव के निशाँ में, लहरों में उबलते बुलबुलों में, हवा के साथ डोलते जहाजों में, नीले पानी में घुलती किरणों कि लाली में, आकाश में उड़ते परिंदों कि कतारों में, सड़क पर झिलमिलाती रौशनी में, केफे से उड़ती मछली कि महक में, एमुज्मेंट की मशीनों से आते शोर में ... ? आज इस रचना ने जाने कितने ही क्षणों के लिए मन के कई उदास तूफ़ान खड़े किये हैं गोया कोई लौट आया हो बेसबब !

अनिल कान्त : said...

एक जीवन नहीं आपने इसमें कई जीवन का सार डाल दिया...कहानी कहूँ या कुछ और लेकिन मुझे बहुत पसंद आई आपकी ये रचना

कंचन सिंह चौहान said...

अकथनीय..निर्वचनीय शंवेदनशीलता..! बहुत अधिक क्या कहूँ...! हाँ महसूस बहुत गहरे क रही हूँ..!

नन्हीं लेखिका - Rashmi Swaroop said...

बेहद ह्र्दयस्पर्शी रचना… नम ह्र्दय इस्से अधिक कुछ कहने के काबिल नहीं… !
धन्यवाद।

नन्हीं लेखिका - Rashmi Swaroop said...

और आपकी शैली तो सबसे 'ख़ास' है ही…

neera said...

ब्लॉग का अपना दिमाग है! मुड है! और तेवर हैं! ... कमेन्ट पब्लिश का बटन दबाते ही तीन कीमती टिप्पणी पोस्ट से गायब हो गई हैं पोस्ट ने आपका दिया सम्मान टेक्नीकल प्रोब्लम की वजह से स्वीकार नहीं किया मैं पोस्ट की तरफ से आप तीनो पाठकों से क्षमा चाहती हूँ ....

raj said...

आज भी चारों तरह बहुत सारा जीवन बिखरा पड़ा है..sunne me kitna achha lagta hai...robert or rachel ki khani se kuchh pal moun ho gyee main...zindgee ke kareeb ki rachna hai ye aapki post...yuhi padh ke bhool jane wali nahi....main nahi kahungee aap achha likhti hai kyunki wo kam hoga...

डॉ .अनुराग said...

क्या कहूं.....मन इतने सारे सवाल रोज लेकर जगता है ..फिर शाम तक आते कुछ जवाब बड़ी मशक्कत से ढूंढ लेता है .कुछ जवाबो को वापस इन्बोक्स में डाल देता है इस उम्मीद में की कभी तो जवाब मिलेगे .आपकी पोस्ट ने जीते जागते कुछ किरदारों को इन्बोक्स से निकल दिया है ....जवाब आज नहीं मिला .....

Apoorv said...

नीरा जी..आपको पढ़ना कहीं तपते सहरा मे किसी आब-ए-हयात को अंजलि-अंअलि भर कर पीने जैसा लगता है..कितना भी पी लें मगर प्यास कम नही होती..बढ़ती जाती है.........

sanjay vyas said...

ज़िन्दगी उदासियों की इतनी शामों में भी कितनी शिद्दत से चमकती है!रेचल और रॉबर्ट के वादा निभाने २५ साल बाद आने से पता चला.पूरी रचना पढने के दौरान भीतर घटती हुई सी प्रतीत होती है.इस जज्बे के सम्मुख नत मस्तक होने का जी करता है.
कहानी की पूरी संरचना में उदासी, सांझ,दुःख,रीतापनअपने गाढेपन के साथ उपस्थित हैं पर उसकी असल आत्मा में चमक, सीपियों का संगीत, ईमानदारी,विश्वास और निर्दोष प्रेम ही है...
इतना कह कर भी कहानी जो और जिस तरह प्रभाव छोड़ती है उसे बताने के उपकरण मेरे पास नहीं है.

neera said...

पब्लिश का बटन दबाते ही टिप्पणियों का गायब हो जाना जारी था... दरअसल इस पोस्ट की टिप्पणियां पता नहीं क्यों अप्रैल में लिखी पुरानी पोस्ट में नज़र आई ...


राकेश जैन said...
adbhut kintu aakarshak

18 September 2009 00:13


vandana said...
gahrayi kiye huye..........ek achcha lekh.

18 September 2009 02:27


अशोक कुमार पाण्डेय said...
उसने मन ही मन सोचा यहाँ की राजनीति तो बिहार की राजनीति जैसी है हमेशा अँधेरा ही इनका साथी रहेगा...

अच्छा लगा यह प्रयोग

20 September 2009 10:52

ANAAM. JASWINDER (001-514-447-1562) said...
Bahut khoobsurat

Man ki gehraayee se nikley
vichar ki unchaayee bahut sundar kahani
Anaam Montreal

20 September 2009 12:11

मीनू खरे said...

"आज भी चारों तरह बहुत सारा जीवन बिखरा पड़ा है ..."

आपकी कहानी तो अच्छी लगी ही साथ ही टिप्पणियाँ भी मार्मिक लगी खास कर डॉ.अनुराग और सँजय व्यास की.

आस्तीन का अजगर said...

समुद्र तट पर ज़िन्दगी और वक़्त का रिश्ता रेत और लहरों के बीच साफ़ देखा जा सकता है. सारांश फिल्म के कुछ दृश्य याद आते हैं.

Harkirat Haqeer said...

समुद्र कि लहरें उनके पाँव को चारों तरफ से चूमती हैं..उनकी घुटनों तक मुडी जींस को छू कर लौट जाती हैं उन्हें दोबारा भिगोने के लिए ... समुद्र ने सूरज को अपने भीतर छुपाने से पहले हाथों में ऊपर उठा रखा है ताकि सब उसे गौर से देख लें...आज की तारीख का सूरज देखने का यह आखरी मौका है... उसका रंग पीले से नारंगी हो चला है .. पर्यटक अपनी चटाई, तौलिये, फ्लास्क, छतरी, सेंडविच बॉक्स समेट रहे हैं ... घोड़ेवाला बच्चों को घोड़े पर आखरी सवारी दे रहा है ... आइसक्रीम वाले के पास अब सिर्फ वेनीला और मिंट फ्लेवर की आइसक्रीम बची है, तट पर चार पांच साल का लड़का रेत का महल पेरों तले रोंद कर खुश हो रहा है और उसकी बड़ी बहन उसकी दीवारें और छत बचाने कि कोशिश में उसे धक्का दे रही है.... उनकी माँ चिल्ला रही है उसे रोंद लेने दो वैसे भी लहरें बहा ले जायेंगी यह महल...

किसी कविता से कम नहीं हैं ये शब्द ....कहीं भीतर तक छू जाते हैं.....!!

Manoj Bharti said...

जीवंत कहानी ! एक-एक शब्द दिल को छू लेने वाला है । जिंदगी के संघर्षों के बीच जीवन कैसे चलता है और साथ कैसे निभाए जाते हैं ; इसकी भावपूर्ण और मार्मिक अभिव्यक्ति की है । परिवेश का चित्रण तो बखूबी उभर कर आया है ।

संजय व्यास के शब्दों जैसा ही मैं भी अनुभव कर रहा हूँ । सुंदर ... रचना । अभिभूत हूँ ।

naveentyagi said...

bahut sundar prastuti hai.

kumar zahid said...

दोनों थक कर बेंच पर बैठ जाते हैं .... रेचल का गुलाबी रंग नारंगी रौशनी में चमक रहा है दोनों की नीली आँखे डूबते सूरज की अनगिनत किरणों को सोख रही हैं .... रेचल ने अपना सर रॉबर्ट के कन्धों पर टिका लिया है .... उनकी आँखों में वो सभी ख्वाब दस्तक दे रहे हैं जो प्यार के समुद्र में गोता लगाने आसमान से उतर कर आते हैं फिर नींद में बस जाते हैं ...

ek ek lahar ese hi zindagi ka sara samudra ban jati. aCchhi bhavabhivuyakti
अगर आप गजल पढना चाहें तो इस पर क्लिक करें

http://kumarzahid.blogspot,com

kumar zahid said...

दोनों थक कर बेंच पर बैठ जाते हैं .... रेचल का गुलाबी रंग नारंगी रौशनी में चमक रहा है दोनों की नीली आँखे डूबते सूरज की अनगिनत किरणों को सोख रही हैं .... रेचल ने अपना सर रॉबर्ट के कन्धों पर टिका लिया है .... उनकी आँखों में वो सभी ख्वाब दस्तक दे रहे हैं जो प्यार के समुद्र में गोता लगाने आसमान से उतर कर आते हैं फिर नींद में बस जाते हैं ...

ek ek lahar ese hi zindagi ka sara samudra ban jati. aCchhi bhavabhivuyakti
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प्रवीण यादव said...

आप प्रेरणास्त्रोत है... मेरे लिए...