Wednesday, 10 February 2010

बाबुल का घर हज़ारों मील नहीं उससे कुछ कोस दूर है...

अगस्त का महिना है, आकाश बिल्कुल साफ है ... इस मौसम में आकाश पर बाद्लों का अधिपत्य होता है फिर भी वो अक्सर जगह दे देते हें सुरज को धरती छुने की और किरणों को जीवों से लिपटने की ...धुली पत्तिया नहा कर सुरज पहने हैं और ख़ुशी - खुशी हवा के साथ् मन्द- मन्द झूल रही हें.... छुट्टी के दिन जब भी ऐसा होता है लोग चींटियों की तरह घर से बाहर निकाल आते हें.. पर्यटन स्थल तो फिर भी उजड़ा रहता है लेकिन कार पार्क जरूर भर जाता है... वो दोनों अपने परिवारों के साथ पिकनिक पर आए हैं वे एक पहाड़ी पर खड़े हें ...और पूरी वादी उनके काले चश्मों में सिमट आई है पहाड़ी के नीचे एक छोटा सा स्टेशन है.. प्लेटफार्म पर बहुतसे पर्यटक खड़े हैं.. दोनो की नज़र बच्चों पर है वो हाथ में आइसक्रीम लिए उन्हे हाथ हिला रहे हैं बच्चों के साथ खडे स्त्री और पुरुष ऐसे हंस रहे हैं जैसे उनमें से एक ने दुसरे को कोई चुटकुला सुनाया हो .. वो उनकी हँसी और चेहरे के हाव- भाव से अंदाजा लगा रहे हैं कि चुटकुला नॉन वेज है ..बच्चे चिल्ला कर कुछ कह रहे हैं लेकिन उन तक आवाज़ नहीं पहुँचती ... वह दोनों .. मुस्कुरा कर बच्चों और बड़ों दोनो को हाथ हिला कर जवाब देते हें...

अचानक वो कहता है मैं अगले वर्ष अगस्त में यहाँ नहीं हूंगा ... उसके पाँव के नीचे की ज़मीन धसने लगती है .और धूप गर्म लगती है.. .. ऐसा सभी कहते हैं लेकिन उसे मालूम है वो जो कहता है वह करता भी है....वह वापस लौटना चाहता है कुछ तो वह समझ सकती है और कुछ नहीं भी...उसे कम्फर्ट जोन नापसंद है और उसके लिए चुनौतियों का अभाव है ...

एक मुकाम हासिल किया है उसने पिछले सात वर्षों में.. नौकरी, अहोदा, वेतन, बोनस, गाड़ी, घर ... वेतन से लेकर गाड़ी का मेक और इंजन साइज़ सब चार गुणा हो गए हैं कम्पनी ही उसका घर और गाड़ी बदलती रहती है और उसके खर्च और खुशी का आयाम वही है जैसा सात वर्ष पहले था.. आम! और देसी! ...सभी को उसकी सफलता का सफ़र एक हाव वे की तरह नज़र आता है जिसमें ना तो कोई गति अवरोधक है और ना ही कोई रेड लाईट ..यदि हों भी तो .. उसकी हंसने और हंसाने वाली बातें हा ..हा...ही ..ही की प्रतिध्वनी उन पर पल में ही फ्लाई ओवर खडा कर देती है और वह अपनी उपलब्धियों को लेकर उसी तरह लापरवाह है जैसे अपने पर्स और सामान के प्रति..उसकी जेब को खाली रहना पसंद है इसीलिए पर्स और जेबों की तना -तानी रहती है ... और अक्सर जेब जीत जाती है ... लन्दन की लोकल ट्रेन में किताबें, अपने लिए खरीदी कमीज़, टाई, जुराबें, छाते, बच्चों के लिए खरीदी फूट्बाल, कापी, पेन्सिल छोड़ना इतनी आम बात थी कि जिस दिन खरीदा समान सुरक्षित घर पहुंचता तो वो खुद और घर वाले हेरान होते ... छुट्टियों से लौटने पर यदि कैमरा सामान में निकल आता तो यह बात, महीने भर के लिए, परिवार, मित्रों और सह्कर्मियों के बीच हेडलाइन बन जाती...

माता-पिता भी अक्सर महीनो उसके पास रह कर लीची और आम के मौसम में वापस लौट जाते और उसे हमेशा शिकायत रहती वह उसे कम और दरख्तों को ज्यादा प्यार करते हैं ... हिन्दुस्तान से आए दोस्तों और रिश्तेदारों का उसके घर आकर ठहरना इतनी आम बात थी कि उसकी अनुपस्थिति में उनको चाबी मिलने में असुविधा ना हो इसलिए घर की दो चाबी दो पड़ोसियों के पास होती ... ... अपने आई एम् एम् के सहपाठियों को ढूढ़ कर सिर्फ सोशल सर्केल ही नहीं बढ़ाया बल्कि उनके गेट टूगेदर आयोजित करने शुरू कर दिए हैं ... उसके इर्द -गिर्द सप्ताह अंत में आने -जाने वालों, होली, दिवाली, न्यू इयर, जन्म- दिन, हाउस वार्मिंग अवसरों को मनाने वालों कि कमी नहीं थी ... अन्ताक्षिरी और नाच गाने में तो वही जितायेगा, चिढाएगा, हंसायेगा और रुलाएगा भी...

वह यू एस की नौकरी ठुकरा कर यू के आया था .. तुम्हारे वहाँ होने से मेरे लिए यह फैसला लेना कितना आसान हो गया उसने फोन पर कहा था ... यह सब उसे एक सपने कि तरह लगा तब, पर यह सपना सिर्फ सपना रह जाने के लिए नहीं था .. एक महीने के भीतर ही सात हज़ार किलोमीटर कि दूरी को दो सौ बीस किलोमीटर की दूरी में बदल गई थी और उसके बाद तो हर दो -तीन महीने में फोन पर कह देता .. मैं तुम्हारे शहर में हूँ मीटिंग के बाद घर आउंगा.. वो दफ्तर जल्दी छोड़ ..घर भागती है ... अरहर दार, पुदीने कि चटनी, भिन्डी और गर्म फुल्का... .

"इस खाने में मां के हाथ की खुशबू आती है... " वो फूल कर कुप्पा .. आंखों में चमक आ जाती ..
"अरे तुम आ जाते हो इसी बहाने मुझे भी ताज़ा खाना मिल जाता है और यह अनार का जूस भी घर में तभी आता है ... वरना तो खाना नसीब हो जाए वही बहुत समझो..." कोई उपहास उड़ाता है
"मेरा और आपकी बीवी का प्यार आपके प्यार से बहुत पुराना है इसलिए मेरी खातिर तो होगी ही ... " कोई चट्नी चाटते हुए नमक मिर्च लगाता है ..
"क्यों लौटना चाहते हो? " उससे पूछे बैगेर नहीं रहा गया..
"बस मन भर गया यहाँ से.. यहाँ दोनो अमानतो को कली से फूल बनते देखा है वहां भाई की परी और टेनिस प्लेयर को बडे होते देखूंगा .. "
उसे रोकने के सभी अस्त्र - शस्त्र इस्तेमाल होने से पहले ही परास्त हो गए .. उसने भीगी आँखों से आसमान की   तरफ देखा और मन ही मन मुस्कुरा उठी ..

"बच्चों को तो गर्मी की छुट्टीयाँ ही नही मिलेगीं, यहाँ स्कूल बन्द हुए हें वहाँ जाते ही खुल जाएंगे.." लौटते समय बच्चो की माँ ने कहा ..
"अरे! भागवान! यह बच्चे कई सालों से छुट्टी पर तो थे यहाँ, असली स्कूल तो अब जायेंगे और स्कूल वाले साथ में तुम्हें भी पढ़ाएंगे ..."
छ वर्ष हो चुके हैं उसे लौटे .. एक सप्ताह के लिए यू एस और तीन दिन के लिए यू के अपने काम के सिलसिले में आ रहा है ... वो दफ्तर से छुट्टी नहीं ले सकी..

बाहर लेबनीज़ खाना खायेंगे, नहीं घर पर ही थाई फ़ूड बना लेते हैं, इन्डियन रेस्टोरेट बुक कर लें, इटेलियन भी खा सकते हैं .. रात को देर से पहुँचेगा टेक अवे ही ले आयेंगे ... सब सुझाव दे रहे हैं .. वह फ्रीज खखोलती है...
"बेंगलोर में इतनी बढिया घीया नहीं मिलती.. घीया चने कि दाल कितनी स्वाद बनी है .."
"तुम क्यों टेबल से उठी... नमक आ जाएगा..कौन पहले नमक लायेगा का कम्पिटिशन हमेशा क्यों जीतना चाहती हो?.."
"ओये! छोटी अमानत! चुपचाप दाल- रोटी खा... एक झापड़ दूंगा नहीं तो ..मेरी बहन को तंग किया तो .." वो मुह बिचकाती का हाथ पकड़ डायेनिंग टेबल कि तरफ खीचता है ...
"यह केक तुने घर बनाये हैं बड़ी अमानत?..बेकरी वाला तुझे पाकर धन्य होगा.. "  बड़ी अमानत उसके हाथ से केक छीन लेती है...
"अरे ऐसे केक खा कर तो कोई बैंकर भी बेकरी ख़ोल ज्यादा कमाएगा ... बर्बाद किये पांच साल मेडिकल कालेज में.. बड़ी अमानत!"... और वो झपट कर पूरा केक मुह में भर लेता है .. रसोई बेकिंग की खुशबू के साथ, हँसी की महक से भर जाती है और रसोई की टाइल केक के कणों से..

"मुझे तौलिया, पजामा , चप्पल और नया टूथ ब्रुश देना..शायद वहीं होटल में छूट गए .. "
"थेंक गाड, मामू! ईट वाज़ नोट लेपटोप, पासपोर्ट, वेलेट एंड कैमरा! ..."
  बड़ी अमानत को बदला लेने का मौक़ा मिल ही गया ...
"यहाँ की हरियाली और खामोशी बहुत सुन्दर है और यहाँ से हिन्दुस्तान और अमेरिका में काम करना भी आसान है..लौटने को मन करता है ." वो सन् लाउन्ज में किताब से मुह हटा कर चाय का कप पकड़ते हुए कह्ता है ..
"हाँ सुबह चार बजे से हिन्दुस्तान और रात बारह बजे तक अमेरिका ... हाउ सेड मामु ..."
बडी अमानत कोइ भी मौका नही चूकती ..
"और दिन भर फ्री टू चिल आउट बेबी ...." वो उसे चाय के साथ नाश्ता लाने का इशारा कर खाली मुह चबाते हुए कहता है...
 "मैं लन्दन का मकान बेचना चाहता हूँ वह सिरदर्द बन गया है.." वो जाते - जाते उससे कह रहा है शायद यह बात कहने का इससे बेहतर मौक़ा वो ढूंढ नहीं पाया...  
"साढ़े पांच साल से किराया मिल रहा है अभी छ महीने से किराया नहीं मिला तो क्या हुआ.. रिसेशन की वजह से हाउसिंग मार्किट भी डाउन है उस पर कोई लोन भी नहीं है ... जल्दी क्या है"
वो कोई जवाब नहीं देता.. सिर्फ मुस्कुराता है...
वो सिर्फ मकान, चार दिवारी और छत नहीं हैं उससे जुड़े रिश्तों की नींव बहुत गहरी है, उसके दरवाजों के हेंडल पर छोटे - छोटे हाथों के निशाँ है वो हाथ लीवरपूल और मानचेस्टर की फूटबाल टीम में खेलने के सपने देखते- देखते बड़े हो रहे हैं क्या पता वो लौटना चाहें वहाँ... फिर वो मकान उसकी उम्मीद है, एक अहसास है, एक संतोष है ... बाबुल का घर हज़ारों मील नहीं उससे कुछ कोस दूर है...

फोटो गूगल सर्च इंजन से

17 comments:

विचारों का दर्पण said...

आपके विचार .आपकी भावनाये .......इन शब्दों की नदियों में साफ़ दिखाई पड़ती है .....बहुत बढ़िया

Ravi Rajbhar said...

Dil ko chhuti hai aapki rachna...bahut achchha likhti hain aapk..kya aapki koe book puplished hai..?

अनिल कान्त : said...

ये रिश्ते भी बड़े अजीब होते हैं...समय के साथ बहते हैं तो बहते ही चले जाते हैं. ये दुनियावी जरूरतें ना जाने कब किस रिश्ते का रुख किधर मोड़ दें कहना बहुत मुश्किल रहता है...

निसंदेह आपकी रचना कुछ एहसास इधर भी छोड़ जाती है

डॉ .अनुराग said...

हर बार जिंदगी की गणित के कुछ ओर सवाल ढूंढने यहाँ आता हूँ ये सोचकर के शायद जवाब भी मिल जाए .....पर लगता है .... ट्रिगनमेट्री अब भी उसी तरह उलझी हुई है .उल्टा उसमे नयी प्रमेय जुड़ रही है .नए फोर्मुले .....जो हेंस प्रूव्ड का इंतज़ार कर रहे है ......

रिश्तों की नींव के लिए पिलर बनने लगे है.....कहते है भूकंप अवरोधी बनाना आवश्यक है.....

Again a masterpiece....

poemsnpuja said...

कैसी कहानियां लिख देती हो, मन किसी घर को लौटने का होने लगता है.

dimple said...

आपकी पिछली कहानियो कि तरह ज्यादा स्पष्ट नहीं थी इसलिए फिर से पढ़ी या हो सकता है मैंने ही ध्यान से न पढ़ी हो पहले.
विदेश में बसते लोगो कि व्यथा ,सब आराम होने पे भी बेआरामी,देश लौटने के चाह सब किसी पोट्रेट कि तरह लगता है.
कभी पंजाबी के इक कहानी पढ़ी थी.
वो घर लौटने के लिए कितने ही यतन करता है,विदेश में हुए खुद पे हमले के बात भी घर वालो से छुपाता है कि परेशान न हो जाये अपने जख्म छुपाता है पर जब वो वापिस न लौटने के बात घर में बताता है तो सब का व्यवहार उसके लिए बदल जाता है और वो वापिस लौटने के सोचने लगता है.


दूरीया कहाँ लाघी जा सकती है.

सागर said...

यहाँ हर बार पाने को कितना कुछ है और ले जाने के लिए भी कितना कुछ... जेब तो फटी नहीं है हाँ ओवर हो गया तो कह नहीं सकता...

sanjay vyas said...

प्रदक्षिणा की तरह लौटता हूँ बार बार यहाँ.हर बार कुछ गिरफ्त से छूटे अर्थ मिलने की हसरत और खुद को समृद्ध करने का लोभ.

Razi Shahab said...

bahut achchi story

PRAN SHARMA said...

ACHCHHEE RACHNA KE LIYE MEREE
BADHAAEE AUR SHUBH KAMNA SWEEKAR
KIJIYE.

गौतम राजरिशी said...

परसों...हाँ, परसों पढ़ा था इसे पहली बार। तब पूरी तरह समझ नहीं पाया था। आज फुरसत निकाल कर तसल्ली से पढ़ा तो अब सोच रहा हूँ कि इस बार छुट्टी में अपनी दीदी से मिलन एअव्श्य जाऊंगा...

"सभी को उसकी सफलता का सफ़र एक हाव वे की तरह नज़र आता है जिसमें ना तो कोई गति अवरोधक है और ना ही कोई रेड लाईट ..यदि हों भी तो .. उसकी हंसने और हंसाने वाली बातें हा ..हा...ही ..ही की प्रतिध्वनी उन पर पल में ही फ्लाई ओवर खडा कर देती है"...बिम्बों की जादूगरनी कहूँ तो अतिश्योक्ति न होगी।

उम्मीद है, हाथ के जख्म अब पूरी तरह भर आये होंगे।

एक बात कहना भूल जाता रहा हूं पिछली कहानियों में भी कि शीर्षक हमेशा गज़ब का चुनती हो आप।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

देर से प्रतिक्रिया के लिये मुआफ़ी…वैसे पहले आकर एक बार पढ़ गया था…

भाषा, बिम्ब वगैरह का आपका चयन तो हमेशा से ही बेहतर रहा है इस बार मेरे लिये संतोष की बात यह है कि कहानी आकार और कैरेक्टर वैरियेशन दोनों में आगे गयी है…मैं भविष्य अगर देख पा रहा हूं तो जल्दी ही हमें एक बड़ी और शानदार कहानी मिलने वाली है…शुभकामनायें

हरकीरत ' हीर' said...

आपकी कहानियों में शब्द शिल्प का चयन इतना बढिया होता है कि वो कहानी के साथ कम ....कविता के नजदीक ज्यादा रहता है ....आपकी कहानियों को इक नया नाम देना पड़ेगा .....काव्यात्मक कथा या कविता कथा जैसा कुछ ......!!

psingh said...

वाह सुन्दर पोस्ट
आभार...........

Ritu Raj said...

लान में एक भी बेल ऐसी नहीं
जो देहाती परिंदे के पर बांध ले
जंगली आम की जानलेवा महक
जब बुलाएगी वापस चला जायेगा
- बशीर बद्र
I know a guy exactly like that, tuff luck you had no option but to bump in to him.

Seema Raj said...

Isko pad kar aap ke haath chumno ko dil karta hai!
per ek yeh bhee baat hai ke bahate panni aur chaltee hawa ka ruk kabee koi rok paya hai.
pata nahee wo iss pal yaha hai to uss pal kaha.

Khush naseeb ha wo jo is bandhan se judee hai

it was just amazing and great to read such depth of writing.
OUTSTANDING

संजय भास्कर said...

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com