Friday, 17 October 2008

पतंग की डोर सा मिल जायेगा...







बिना बताये चला आता है
बीच का यह अंतराल,
अँगुलियों से चुक गए शब्द
आंखों से गुम चाँद की कसक,
सपनों की नींद से
वही पुरानी खटर-पटर,


आज और अभी का चाबुक
दशकों को चुटकी में मसल,
आखों के गढों पर
उम्र की परत चढ़ा,
नए - पुराने सभी जख्म भर देता है।

धरकनो से निकल
जिन्दा पलों की महक,
थके पाँव में पंख लगा देती है।

एक आस
अधखुली आखों से,
अलार्म को अनसुना कर
सपनों को दबोच,
करवट बदल पलकें मूँद लेती है।

कविता उसे लिखेगी
सूर्यास्त बुलाएगा,
कभी न कभी तो खोया आसमा
पतंग की डोर सा मिल जायेगा।

5 comments:

Anonymous said...

बहुत ही अच्छी कविता है.

Viraj said...

beautiful poem...simple yet multi-layered and really nice tempo. I love the way you link the daily chores to more deeper emotions

Dr. Nazar Mahmood said...

बहुत् ही सुन्दर

paraa vaani said...

सुन्दर अभिव्यक्ति है

paraa vaani said...

सुन्दर अभिव्यक्ति है