Tuesday, 23 March 2010

उसकी नीलिमा पर बादलों ने लिखा था..


क्सर उसकी आँख बर्तनों के खड़कने की आवाज़ से खुलती है या फेरीवालों और भिखारियों की पुकार से, नहीं तो अखबार वाले या फिर दूधवाले की घंटी से... लेकिन आज ऐसा नहीं हुआ ...पानी की कल-कल से नींद खुली... बाहर आकर देखा तो कटे पाइप से पानी बह रहा है ऐसा लगा जैसे गर्भनाल से पानी का मीटर कटा हो... छप-छप और ढूंढा-डांडी में जितनी देर पानी रोकने का जुगाड़ कर पाता.. मिनिस्पलटी वालों ने मुझसे बाजी मार् ली और पानी रोक दिया... पत्नी बेटे सहित गर्मी की छुट्टियों में अपने मायके में है वर्ना पानी के मीटर की चोरी में भी मेरा कसूर होने का कोई कारण खोज लेती... पानी बेकार होने से बचाने की जल्दी में यह भी ख्याल नहीं आया कि ज़रुरत का पानी तो भर लूँ... भला हो पड़ोसियों का... जिन्होंने पानी का मीटर चोरी हो जाने का अफ़सोस के साथ बाल्टी भर पानी नहाने को और पतीला भर पानी पकाने को दिया... अफ़सोस वाली पानी की बाल्टी में नहाते हुए मुझे इसी बात का अफसोस रहा ... इतने बड़े शहर में मेरे ही घर का मीटर चोरी क्यों हुआ? और अफ़सोस वाले पानी की चाय पीते समय इस बात का अफसोस कि दफ्तर जाने से पहले पुलिस चौकी जाना होगा .. वैसे पिछले आधे घंटे से अफ़सोस जाहिर करने के साथ-साथ पड़ोसियों ने सलाह भी दी कि मिस्त्री को भेज कर नया मीटर लगा लो आप तो पी डब्लू डी में काम करते हैं आपको पानी के मीटर की क्या कमी... नहीं मुझे पुलिस स्टेशन जाना है मैने जोर देकर कहा... सहानुभूति दर्शाने वाले सभी मुस्कुराए... शायद मेरी कायदे-कानून पर बची-खुची निष्ठा पर या उठाई गिरि की इस हरकत को इतनी गम्भीरता से लेने पर ... मैं इस शहर का कायदे- क़ानून मानने वाला सरकारी नौकर हूँ ... चोरी की रिपोर्ट लिखवाना मैंने अपना हक़ और कर्तव्य समझा ..

जून के महीने में दो किलोमीटर पैदल चल कर मैं पसीने से लथ-पथ पुलिस स्टेशन पहुंचा ...
"मुझे रिपोर्ट लिखवानी है मेरा पानी का मीटर चोरी हो गया है"... कुर्सी पर उंघते हुए पुलिसवाले के सामने बैठते हुए कहा..
"देखिये साहब आपके पानी के मीटर का चोर हमने पकड़ लिया है" उसने कोने में बैठे एक सत्रह -अठारह वर्ष के लड़के की तरह इशारा किया जो अपना मुह घुटनों में दिए बैठा था उसके फटे कपड़े और हाथो पैरों पर नील के निशाँ पुलिस के कहर की कहानी बता रहे थे.. चोर के पकड़े जाने का उत्साह ... उसकी हालत देखते ही गायब हो गया ...उसके सामने पांच-छ पानी के मीटर रखे थे...मुझे चोर से सहानुभूति हुई ...चोर से अपना ध्यान हटा मैंने मीटर से ही मतलब रखा जिसे मैं दूर से ही पहचान गया...कितनी बार उसकी चूड़ियाँ कसी थी, वाशर बदले थे, पाइप के मुह में डाला था... पर उसे भी आदत थी हर दुसरे-तीसरे सप्ताह टपकने की ओर मेरे हाथों टप-टप पुछ्वाने की....
"सुबह साढ़े चार बजे हमने पेट्रोल करते समय पकड़ा है साले को..." पुलिसवाला मुछों पर ताव देते हुए बता रहा था
"वो लम्बे पाइप वाला मीटर मेरा है... चाहे तो आप उस पर लिखा नंबर मेरे पानी के बिल पर लिखे नंबर से मिला लें..."मैंने झट अपनी जेब से पानी का बिल निकाल पुलिस वाले के हाथ में थमा दिया..मुझे मालुम था यह मीटर मेरा है यह मुझे साबित करना होगा इसलिए घर से पानी का बिल अपनी जेब में डाल कर चला था...
"इसकी तो पूरी कार्यवाही की जायेगी.. आप अपना मीटर नही ले जा सकते... यह माल खाने में पहले जमा होगा.. आप दो दिन बाद माल खाने से ले जाना... तब तक यह वहाँ पहुँच जाएगा.. " पुलिस वाला पानी के बिल से नाम, पता और नंबर नोट करते हुए बोला...
"लेकिन... यह मीटर ... "
"साहब यही कायदा है आपको यह मालखाने से ही मिलेगा..."
वो मेरी बात बीच में काटते हुए बोला...
पुलिसवाले ने पर्ची पर मालखाने का पता लिखा,रजिस्टर में मेरे हस्ताक्षर लिए...और मुझे रिपोर्ट की रसीद दी..

दो सौ रुपये बचाने को, किसी ना किसी तरह पाइप का मुह बन्द किया, दो दिन पड़ोसियों के घर से पानी लेकर काम चलाया और तीसरे दिन आधा दिन कि छुट्टी ले.. ढूंढता हुआ पहुँच गया माल-खाने में... माल खाने के मालिक को सभी जरूरी कागज पकड़ा.. मालखाने में झाँकने लगा ... शायद पानी का मीटर मुझे देखते ही मेरे पास दौड़ कर आ जाएगा ...
"यह तो केस चलेगा आप वकील लेकर आइए... " माल खाने का मालिक कागजों पर उड़ती नज़र डालते हुए बोला..
"अरे! कोई वकील पैसे बिना तो आएगा नही.. दो सौ रुपये की चीज के लिए मैं क्यों वकील के चक्कर में पडू
बहस -बंदी के बाद भी माल खाने का मालिक टस से मस नही हुआ और मुझे सारे कायदे-कानून के पाठ पढ़ा दिए ..

लौटते हुए नया मीटर खरीदा और दुकानदार को देते हुए दौ सौ बीस रूपये हाथों में कील की तरह चुभे और जब मैंने नया मीटर लगाया उससे अधिक चुभी पड़ोसियों की मुस्कराहट... 

कुछ दिन तक जब भी नए मीटर को देखता... दौ सौ बीस रूपये और मालखाने में इंतज़ार करता मीटर याद आता... फिर धीरे-धीरे मैं उसे भूलने लगा और मेरे आसपास सब कुछ बदलने लगा..घर के पीछे जो अमरुद का बाग़ था वहां इमारतें बनी.. जहां से चिड़ियों के चहकने  और ज़मीन पर कुतरे अमरुद की जगह एयर कंडिशनर से  आवाजें और गर्म हवा आने लगी... राज्य के दो टुकड़े हो गए... शहर राजधानी बन गया... अब यहाँ पानी के मीटर नहीं चोरी होते.. वो सामने लगी ए टी एम् मशीन गायब हो जाती है.. घर के सामने वाले पार्क में जहाँ कालोनी के लड़के नेटबाल और क्रिकेट खेलते थे... वहां लोग एक दुसरे कि आँख बचा कूड़ा फेंकते हैं... पार्क की घास की देख-रेख का काम मिनिस्पलटी को नहीं.. गायों का मिला हुआ है वो उसकी लम्बाई की ही देखभाल नहीं करती बल्कि गोबर से घास को पवित्र और उपजाऊ रखती हैं .. शाम को अँधेरे में पार्क की बेंचो पर अजनबी लड़के- लड़किया गले में हाथ डाले चिपक कर बैठे होते हैं जिन्हें देख कर अनदेखा करना गैरत ने सीखा दिया है... घर के पड़ोसियां ने अपने घर दुमंजिले कर लिए हैं...बढ़ते परिवार को साथ रखने के लिए नहीं... किरायेदारों को आसरा देने के लिए... सड़क के साथ जो नहर थी उसको दफना कर सड़क चौड़ी कर दी गई है... पैदल चलने के लिए फुटपाथ नहीं... पक्की सड़क है और ट्रक, गाड़ी, बसों, टेम्पो के बीच बूढ़े, बच्चे, जवान हर किसी में जान हथेली पर रख अपने कदमो के हिस्से की सड़क हथियाने की हिम्मत है... सड़क के दोनों ओर दुकाने और ब्यूटी पार्लर कुकरमुत्ते की तरह उग  आये हैं ...  
शहर के साथ वह भी बदल गया.. चेहरा बदल गया है, बालों का रंग बदल गया है, आँखों की रौशनी बदल गई है, वह ससुर और फिर दादा बन गया है ......

"आप ही सूरजभान शर्मा है? गेट पर खड़ा पुलिसवाला पूछता है..
"जी हाँ..." मैं अखबार से मुह हटा कर उसे एक तरफ रखते हुए कहता हूँ
"आपके यहाँ चोरी हुई थी?" वो गेट खोल कर बरामदे में घुस आया...  
"नहीं तो..." मैं कुर्सी से उठ कर खड़ा हो गया..
"आपका पानी का मीटर चोरी हुआ था?.."
"फिलहाल तो वह भी चोरी नहीं हुआ "...बाहर बरामदे में लगे मीटर को देखते हुए कहा..
"केस ख़त्म हो चुका है यह रहा आपका मीटर..." उसने प्लास्टिक के थैले से निकाल कर मेज पर रख दिया और मुझे एक कागज़ पर दस्तखत करने को कहा...
मीटर ने मुझे फ़ौरन पहचान लिया ... पुलिसवाले के जाने के बाद देर तक मीटर को घूरता रहा.. उसे उठाकर अलट-पलट कर देखा...आँखों से दूर ले जाकर देखा.. आँखों के नज़दीक लाकर देखा...उसकी सुइया वहीं रुकी हुई थी.. वह बिलकुल नहीं बदला था ... टप- टप पानी गिरता नज़र आया .... हथेली मली वह बिलकुल सूखी थी... फूंक मारकर उस पर जमी धूल साफ़ की..कुरते से उसे रगड़ा और पास पड़ी कुर्सी पर टिका दिया..  बरामदे की चार दिवारी से बाहर देखा.. पार्क की घास कुछ ज्यादा हरी लगी ... और बेंचो पर एक दुसरे से सटी बैठी छाया देखकर झल्लाया नहीं मुस्कुरा दिया .. गेट पर लगे अशोक के पेड़ से चिड़िया के चहचहाने की आवाज़ आई.. नज़रें ऊपर उठी और आसमान की तरफ गई ... वो भी मुस्कुरा रहा था और उसकी नीलिमा पर बादलों ने लिखा था.. यहाँ देर है अंधेर नहीं...

फोटो- गूगल सर्च इंजन से

24 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत खूब किस्सा गोही रही मीटर चोरी की...लगा भगवान के घर देर है अंधेर नहीं टाईप की न्याय व्यवस्था हो गई है. :)

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हिन्दी में विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!

लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.

अनेक शुभकामनाएँ.

संजय भास्कर said...

बहुत सुन्दर रचना । आभार
ढेर सारी शुभकामनायें.

Sanjay kumar
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

देवेश प्रताप said...

बहुत बढ़िया लेख ..........आपकी लेखन में एक अलग सा जादू है ......बहुत बहुत आभार

Viraj Tyagi said...

Beautiful didi...amazing wordsmithy. This time around the story telling is well paced (some times its too fast) and the culmintation is unhurried. Really good.

वन्दना said...

किस्मत वालों के साथ ही ऐसा होता है।

anjule shyam said...

han der hai andher nahi bhale hi insaf pane wale ki char pidhiyan gujar jayen...

कंचन सिंह चौहान said...

होंठ पर मुस्कुराहट ‌और मन में गंभीरता आई इसे पढ़ने के बाद...!

बेहतरीन हमेशा की तरह।

सारिका सक्सेना said...

आपकी अन्य कहानियों से कुछ अलग हट कर लगी ये कहानी। एक मुस्कुराहट भी चस्पां हो गई होठों पर ,चलो कुछ ज्यादा देर नहीं हुई वरना अंधेर हो जाता।
























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डॉ .अनुराग said...

अक्सर आपको पढने के बाद .....एक उदासी .एक ...अजीब सी शून्यता या कहिये रियल्टी के कई चेहरे देर तक पीछा करते है ........आज बड़ी आदमियत की बू आई ....सिमटम अच्छे नहीं है ......नीरा u r wonderful ...

सागर said...

कुछ चीजें बहुत कॉमन होती हैं कल घर जा कर यह पढ़ा था. अभी कल ही की तो बात है यह सब मेरे साथ हुआ था नहीं नहीं ऐसा शायद हर आदमी से साथ होता होगा पर यह इतना नोर्मल है की इसे लिखने की कोई सोच नहीं सकता लेकिन यहीं से काम शुरू होता है आपका... हमने बस हाँ में हाँ मिलायी है. "हाँ ऐसा ही हुआ था, हाँ यही तो होता है टाइप"

सफल रचना. बांधे रखा... पंजाबन वाली कहानी भूल नहीं सका हूँ आज तक.

हरकीरत ' हीर' said...

अंत आते आते कहानी को जो मोड़ दिया आपने वही आपकी सफलता है ......ये कोर्ट कचहरी के चक्कर ऐसे ही होते हैं बीजता कोई है खता कोई है ...यहाँ तो बीजने वाले को ही खाने को मिल गया .....बहुत खूब ....आपने साधारण सी घटना में जान डाल दी ......सफल लेखन ......!!

अशोक कुमार पाण्डेय said...

वाह यह अलग तरह की लघुकथा भी ख़ूब रही। हल्की-फुल्की सी भाषा में रचा एक संवेदनशील सटायर। यह विविधता उम्मीद जगाती है नीरा जी…

singhsdm said...

किस्सागोई.........अच्छा तिलिस्म है कहने-लिखने का.......!

Kishore Choudhary said...

आह...
बस इसी करीने की ज़िन्दगी बची हुई है. आपके पात्र ज़मीन को मजबूती से थामे रहते हैं. प्रवाह मद्दम होते हुए भी बड़े भंवर सामने ला खड़े करता है. मुझे हर बार ख़ुशी होती है कि मैं आपकी लेखनी का बेवजह दीवाना नहीं हूँ.

singhsdm said...

बहुत सुन्दर रचना । आभार

अपूर्व said...

पानी के मीटर की यह व्यथाकथा बड़ी अलगे लगी जिसे कोई भुक्तभोगी ही लिख समझ सकता है..मगर मै सोचता हूँ कि उस बेचारे मीटर पे क्या गुजरती रही होगी इतने साल..जो उसने स्टोररूम के सीले हुए अंधेरे मे अपने मालिक को याद करते हुए गुजारे होंगे..यह जानते हुए भी कि उसकी जगह को एक नये मीटर ने रिप्लेस कर दिया है..और मुसीबत दूर होते ही मालिक की स्मृतियों से वह भी दूर हो गया होगा..

sanjay vyas said...

राइटर के किचन में बने इस जायके ने एक अलग ही आनंद दिया है.अनुराग जी से सहमत हूँ, इसमें वो परिचित ग्लूम नहीं है.आपकी विविधता को बरत सकने की कुशलता का प्रशंसक हूँ, आज भी ये बात जोर देकर कहता हूँ.

कुश said...

इस से पहले आपको पढ़ते हुए कभी मुस्कुराया नहीं.. वर्सेटाईल तो आप है ही.. बाकी चुप्पे चुप्पे वक़्त बदलने वाली जो गहरी बाते आपने लिखी है.. वो कलम पे आपकी पकड़ साफ़ साफ़ बयां करती है.. ईमानदारी के बीच आती क़ानून व्यवस्था पर भी करारा व्यंग्य है इसमें.... कुल मिलाके काम की बात उम्दा अंदाज़ में कहने का तरीका पसंद आया मुझे.. और हाँ! वंडरफुल तो आप है ही..

गौतम राजरिशी said...

wow...superb!

नीरा का नया अंदाज़ और खूब अंदाज़। बदलते शहर का हर बिम्ब अपने घर वाले शहर जैसा घटित होता लगा और कथाकार की लेखनी पे बरबस मन मुग्ध हो उठा{वैसे इस लेखनी पे मुग्ध होना कोई नयी बात तो नहीं कि जिक्र किया जाय, फिर भी सोचा कि...} और अंत का वो ट्विस्ट कथ्य को अंजाम तक पहुंचाता हुआ।

कहीं पर ब्लौग-लेखन में कहानी-लेखन का पुरुस्कार बँटता नजर आया था। अजीब-सा लगा कि उसमें "नीरा" और "किशोर चौधरी" का नाम न था। विरोध दर्ज करवा आया...

ठाकुर पदम सिंह said...

आपका लेखन शैली तो अभिभूत कर जाती है... अपलक पढ़ गया सम्मोहित सा होकर ... क्या कहूँ लगा जैसे कोई नज़्म पढ़ रहा हूँ ... कोई फिल्म देख रहा हूँ... सच एक ही शब्द कहूँगा इस पोस्ट के लिए "सुपर्ब"

Vidhu said...

सुख ही की तरह अनुभव भी आदमी को मांजता है ...एक सुघड़ रचना आपको साधुवाद ...एक अलग किस्म के विषय पर लिखना बहादुरी है ...फिर शब्दों और वाक्यों और विचार को भले तरीके से प्रस्तुत करने के लिए बधाई

singhsdm said...

बहुत बढ़िया किस्सा..........आपकी लेखन में क्या खूब एहसास- परस्ती है ......बहुत बहुत आभार

Vidhu said...

दुःख ही की तरह अनुभव भी आदमी को मांजता है ...एक सुघड़ रचना आपको साधुवाद ...एक अलग किस्म के विषय पर लिखना बहादुरी है ...फिर शब्दों और वाक्यों और विचार को भले तरीके से प्रस्तुत करने के लिए बधाई....

ई-गुरु राजीव said...

बहुत बढ़िया लेख......हमेशा की तरह.