Tuesday, 13 April 2010

लिली सूख गई है और केक्टस......

वो जो परिंदों के हाथ भेजते थे रोज एक नयी उड़ान, छत पर जाकर उन परिंदों को दाना डालो, वो भूखे मर रहे हैं और मेरे पंख झड़ गए हैं... अपने हाथ बगल में रखो, मेरे पेट की तितलियाँ ना जगाओ, जंगल में भवरों से फूल मांग, सुई धागा ढूंढ, बालों के लिए गजरा गुथो...... वो छाया सिर्फ रात को ही मेरी पहरन ना बने, जब- जब मौसम जिस्म को बर्फ बना दें वो धूप की रौशनी में मेरी आखों की खामोशी पढ़े ..... चांदनी- चौक की भीड़ में खोने के डर से मेरा हाथ ना थामो,  घर की दीवारें जब मैदान नज़र आयें और मैं बदहवास भागती हुई तुम्हें आवाज़ लगाऊं, तुम अपना मोबाइल फेंक... मेरे पास आओ, ज़मीन पर फूक मार, बिना कोई प्रश्न किये मेरे पास कुछ देर बैठे रहो..... मेरे तिल हो गए हैं गूंगे बहरे, उन्हे जुबान दो, आधी रात को सड़क के बीचों बीच गाड़ी रोक, चाँद को रिझाते हुए, उस किताब की कविता गुनगुनाओ जिसके हाशिये में मेरा नाम है और कविता के नीचे तुम्हारा..... नहीं जाना तुम्हारे साथ काफी हाउस और इटेलियन रेस्टोरेंट, मुझे हनुमान मंदिर वाले पहाड़ पर चढ़ना है तुमसे आगे-आगे, शायद कोई पत्थर रहम करे, मेरे मोच लगे पाँव को ना सहलाना और ना ही गोदी उठा घर लाना, पाँव ठीक होने तक मेरे साथ वहीं कुछ दिन ठहर जाना, मेरे लिखे खतों को दोबारा पढ़ना और  अपने एकांत और दर्द को डायरी में सहेज सिरहाने रख देना.... वो जादू की छड़ी तुमने कहाँ खो दी? तुम कोरे कागज़ को मुट्ठी में भींच मेरा नाम ले हवा में उड़ाते थे.... और आकाश में खिल उठता था इंद्रधनुष और वो झुक कर कानो फुसफुसाता धीरे से यू डू टू मी व्हाट स्प्रिंग डज़ टू चेरी ट्री.... याद है वो सपना जिसकी नीव चार गर्म हाथों ने बिना दस्ताने पहने स्नो मेन बनाते हुए बरफ पर रखी थी... देखो! सपनों की दीवारों से प्लास्टर झड़ रहा है कितनी बार कहा है सीमेंट और रेत लाकर पुराने प्लास्टर को खुरच, नया प्लास्टर कर दो, सूखने के बाद दीवारों पर रंग मैं कर लुंगी, मुझे याद है उस हरियाली का रंग जिसे तुम्हारी आँखों में देख मैं पागल हुई थी... क्या तुम्हें भी याद है वो चेहरा जिसके बहते काजल के इंतज़ार का हर पल तुम्हारा था..यह राज तुमने ही मेरे इंतज़ार को बताया था.... तुम जो लिली और केक्टस लाये थे मैंने टैग पर लिखी सभी हिदायते निभाई फिर भी लिली सूख गई है और केक्टस वैसे का वैसा उसे तो मैंने कभी पानी भी नहीं दिया....तुम्हारे होंठ क्यों छिल जाते हैं मुझे चुमते हुए.....

फोटो: गूगल सर्च इंजन से

23 comments:

दिलीप said...

srijanatmakta aur chitratmakta ka anutha sangam....waah...bahut achcha likha...
http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

Udan Tashtari said...

बहुत प्रवाहमयी भावपूर्ण उदगार.

M VERMA said...

जादुई उद्गार
बेहतरीन

Unknown said...

जवाब नहीं आपके लेखन .......का .

के सी said...

एक शानदार कविता
इसमें घुले हुए मौसम, आप बतियाते हैं. पहली पंक्ति से ही एक जादू सा संवरने लगता है कि धीरे पढ़िए और धीरे... कि कहीं छूट ना जाये कोई एक क्षण.
जब मौसम जिस्म को बर्फ बना दें, वो धूप की रौशनी में मेरी आखों की खामोशी पढ़े ... कि किसी भी मौसम में मेरी इन आँखों ने तुम्हारे ख्वाब को खोने नहीं दिया है.
जिसके हाशिये में मेरा नाम है और कविता के नीचे तुम्हारा... यही हो जाना भी चाहती हूँ भले ही कभी तुमने मेरा नाम हाशिये से अलग कविता के नीचे अपने बराबर नहीं लिखा.
यू डू टू मी व्हाट स्प्रिंग डज़ टू चेरी ट्री... ऐसे ही भीतर का मन बाहर की ओर प्रवाहित होकर मौसम को अपने अनुरूप खिला लिया करता है.
हरे केक्टस ने जो अजीर्ण मुहब्बत पाई है, उसको समझाने को आपकी ये कविता मुकम्मल कविता काफी है.इस कविता के बारे में कुछ भी मेरे लिखा हुआ शायद स्थायी बन सकेगा क्योंकि हर बार कुछ नए रंग दिखाई देते रहेंगे. ज़िन्दगी के तवील दुःख और छोटी ख़ुशी के अबूझ पैमाने लिए मैं इसे फिर पढ़ने आऊंगा.

डॉ .अनुराग said...

नज़्म सरीखी शिकायते है ..भीगी भीगी सी.....पूरा स्क्रीन कुछ बूंदे दिखा रहा है .......

रंजू भाटिया said...

और कैक्टस वैसे का वैसा उसे तो मैंने कभी पानी भी नहीं दिया......सब कुछ मुझे तो इन्ही लफ़्ज़ों में छिपा दिखा ...लाजवाब कर देने वाली कलम है आपकी

देवेन्द्र पाण्डेय said...

...देखो! सपनों की दीवारों से प्लास्टर झड़ रहा है कितनी बार कहा है सीमेंट और रेत लाकर पुराने प्लास्टर को खुरच, नया प्लास्टर कर दो, सूखने के बाद दीवारों पर रंग मैं कर लुंगी...
---यूँ तो गद्य की तरह लिखी यह पूरी नज़्म ही बेहतरीन है मगर ये पंक्तियाँ दिय में उतर गईं।
--ज़िंदगी मरम्मत मांगती है बसंत से पहले।

anjule shyam said...

diwaron ki dhool najm ban ke aankhon se jhad rahi hai...........

vandan gupta said...

तुम जो लिली और केक्टस लाये थे मैंने टैग पर लिखी सभी हिदायते निभाई फिर भी लिली सुख गई है और केक्टस वैसे का वैसा उसे तो मैंने कभी पानी भी नहीं दिया....तुम्हारे होंठ क्यों छिल जाते हैं मुझे चुमते हुए.....
sare ahsaas , sare jazbaat , sab kuch kaha ankaha in panktiyaon mein sama gaya hai............gazab ki prastuti.

Ashok Kumar pandey said...

क्या कहूं? कविता? कहानी? लगता है ऐसे मुक्त बहते टुकड़ों को बस पोस्ट ही कहा जा सकता है! भाषा एक साथ निर्मल, वैद और अमृता प्रीतम की याद दिलाती है। बस इतना कह सकता हूं कि -- सुन्दर पीस!

varsha said...

उस किताब की कविता गुनगुनाओ जिसके हाशिये में मेरा नाम है और कविता के नीचे तुम्हारा.....kuch aisa hi jadoo in panktiyon mein jaisa spring ka cherry tree par hota hai.

सागर said...

क्या कविता है भाई वाह ! एक सांस में पढ़ गया...

मेरे तिल हो गए हैं गूंगे बहरे,
म कोरे कागज़ को मुट्ठी में भींच मेरा नाम ले हवा में उड़ाते थे.
मेरे पेट की तितलियाँ ना जगाओ

कमाल है... शपथ.

पारुल "पुखराज" said...

बहुत अच्छा है -आँखों का हरापन ,बहता हुआ काजल ...

अपूर्व said...

ऐसी रचनाएं पढ़ कर ही कविता, कहानी वगैरह के बीच के फ़र्क कम होते जान पड़ते हैं..हर एक पंक्ति जैसे खुद को बार-बार पढ़ा जाना माँगती है..और जेहन के बदन पर जोंक जैसी चिपक जाती है..जबर्दस्त!.खास कर यह
’घर की दीवारें जब मैदान नज़र आयें’
’बहते काजल के इंतज़ार का हर पल तुम्हारा था..यह राज तुमने ही मेरे इंतज़ार को बताया था’
’जब- जब मौसम जिस्म को बर्फ बना दें वो धूप की रौशनी में मेरी आखों की खामोशी पढ़े’

और कैक्टस को जिंदगी ही इतना रूखा और अदम्य बना देती है..वरना कितने हैं जो पानी देंगे उसे..कैक्टस एक प्यास है और प्यास बिना पानी के ही जिंदा रहती है!

sanjay vyas said...

क्या लिखूं. एक लाइन कहीं सुनी याद आ रही है-
"no one is stranger under a cherry's tree".
इस पवित्र पेड़ के तले ऐसा ही अहसास होता है.

डिम्पल मल्होत्रा said...

ik hi sans mein sari post padh li or ik lambi sans li.jane kya kya ankho ke samne gujar gya.itna bhi sabr na hua ki hindi me type karun.abhi in ahsaso mein gum hun bahr niklun to kuch hosh karun...ultimate..

गौतम राजऋषि said...

गूंगे-बहरे हो गये तिल को जुबान देने का आह्वान...उफ़्फ़्फ़, कितनी ही तस्वीरें उभर आयीं। i am at loss of words...what to say!

कोई कहानी-सी कहानी ये
कोई कविता-सी कविता...

हनुमान मंदिर वाले पहाड़ पर चढ़ने का दृश्य साकार हो उठता है अपनी ही जिंदगी के कुछ धुंधला आयी तस्वीरों से उठकर..और पैरों में मोच आने की ख्वाहिश किसी रहमदिल पत्थर की बदौलत- खुद का भोगा हुआ रचनाकार का यथार्थ इन अद्‍भुत इमेजों से उभरता हुआ उसके पाठकों को भिगा जाता है खूब-खूब भीतर तक...

i wish i could have written these lines...o' wishful thinking!

mridula pradhan said...

atyant bhavbhini rachna ,achchi lagi bahut.

हरकीरत ' हीर' said...

आधी रात को सड़क के बीचों बीच गाड़ी रोक, चाँद को रिझाते हुए, उस किताब की कविता गुनगुनाओ जिसके हाशिये में मेरा नाम है और कविता के नीचे तुम्हारा.....

सुभानाल्लाह .....कुर्बान जाऊं इस जुमले पर ......!!

तुम जो लिली और केक्टस लाये थे मैंने टैग पर लिखी सभी हिदायते निभाई फिर भी लिली सूख गई है और केक्टस वैसे का वैसा उसे तो मैंने कभी पानी भी नहीं दिया...

ओह .....

इक दिन
समय ने कहा
आ तुझे गुलाब से मिला दूँ ...
रुत हँस कर बोली
रेगिस्तानों में गुलाब नहीं खिलते .....

आपकी लेखनी में वही दर्द है ......

अरुणेश मिश्र said...

घायल की गति घायल जानै - प्रशंसनीय रचना ।

रचना दीक्षित said...

वाह !!!!!!!!! क्या बात है..... बहुत जबरदस्त अभिव्यक्ति.

मुकेश कुमार सिन्हा said...

behtareen rachna, mere pass shabd hi nahi hai........aapke post ab niyamit rup se dekhne parenge......!!

samay mile to inko dekhna...plz
mere jindagi ka canvess!!
jindagikeerahen.blogspot.com