Wednesday, 28 April 2010

फोन कुछ पलों के लिए गुंगा हो गया.....

हज़ारों मील दूर जिस ज़मीन के टुकड़े का विस्तार और मिट्टी का रंग भी याद नहीं उस पर सोने की बालियाँ उगी नज़र आती हैं... जिस बाग़ के पेड़ों के फल का स्वाद जुबान से घीसे पत्थर की तरह उतर चुका है उसकी रखवाली के लिए हर साल बागवान बदला जाता है शायद नया बागवान आठ हज़ार मील दूर आम का टोकरा लिए दरवाज़े पर आवाज़ लगाएगा..मेढ़ पर बिना लगाये कितना बथुए का साग उतरता था यह जरूर उसे बेचते होंगे... और वो मोड़ की ज़मीन सड़क से लगती है उस पर किससे पूछ कर काँटा लगवा बुग्गियों की लाइन लगी रहती है और फिर भी उनकी जेब खाली रहती है... दीवारों से उखड़ा हुआ प्लास्टर, छत में दरार पड़ी कड़ी ठीक नहीं करा सकते... नल का हत्था पिछले आठ साल से टूटा है... यह बेंत की कुर्सी मां के दहेज़ की, तार -तार हुई पड़ी है मां की आत्मा को कितना कष्ट होता होगा, पिछली बार भी कहा था बुनवा लो... पिछले सोलह साल से कोई हिसाब नहीं दिया, कई लाख निकलते होंगे.. बेटिया जवान होने से पहले ही बूढी नज़र आती है कम से कम उन्हे ही ब्याह दें...कुरते पजामे का वही बरसों पुराना मटमैला रंग जिसे याद भी नहीं वो कभी सफेद था.. नाख़ून में कालिख भरी अँगुलियों में पांच सौ पचपन की बीड़ी और गले से वही खों - खों...

दीवारों की परछाई, छत के कबूतर, खम्बे पर अटकी पतंग, पड़ौस  के बैल, ताई की गालिया, सड़क पर आवारा कुते , घेर में वो हुक्के की आवाज़ बिना नज़र उठाए पहचान लेते थे और अब नयी सड़क ही नहीं, घर की पुरानी इंट भी नाम पूछती है और इस घर की इंटों में वो जिंदगी बसी है जो वहां रहते लाचार लगती थी और परदेस रहते आपार... कोई घर-ज़मीन बेचने की सलाह दे तो लगता है मुफ्त में हथियाना चाहते है, भाव कितने बढ़ गए है और क्यों बेच दें .... क्या मुह दिखायेंगे ऊपर जाकर पिता, दादा, परदादा, पूर्वजों को ....

दरवाज़े पर मोटरसाइकल रूकती है... जिसे नाक बहता छोड़ कर गए थे वो मोबाइल जेब से निकालता है...
"यह दहेज़ में मिली है बुलेट तुझे सत्तू? .." एक बेहुदा मुस्कराहट पूछती है....  
"लल्लन! मैं तो बहुत मना किये हमे ना जरुरत सफ़ेद हाथी की पर लड़की वाले नहीं माने ..अब क्या करें .."
"क्यों सत्तू तेरे ससुराल वाले डालते है इसमें पेट्रोल या मेरे हिस्से की ज़मीन?... " 
तीन पाँव की टेबल पर मक्खी से भिनभिनाते पीतल के कटोरे में रखी बर्फी और समोसे के सामने बेन-शर्मन की टीशर्ट, केल्विन-क्लाइन की जींस, आँखों पर रेबंस का काला चश्मा, अपने से बड़े और छोटों का अपमान करने का दुस्साहर दे ही देते है...
"अरे लल्लन एक-एक पैसे का हिसाब करूंगा...तू चिंता ना कर इसकी नौकरी लग जाए जरा.... "
जैसा हमेशा से होता आया है आसमान से तकाजा और अपमान फिर एक-दो बरस के लिए बाढ़ और सूखे की तरह टल गया  ...

खबर आई है अँधेरे में बुलेट को ट्रक वाले ने पीछे से आकर हल्का सा धक्का दिया और सत्तू का सर ट्रक के पहिये के नीचे कुचला गया.. सत्तू को नौकरी तो नहीं मिली और अब जिंदगी भी नहीं रही .. एक बेटा मिला जो अब दो वर्ष का है एक और बेटा या बेटी तीन महीने में आने वाला या आने वाली है... और पिता को चार दिन शहर में उसे वेंटिलेटर पर रखने के बाद लाश के साथ डेढ़ लाख का बिल मिला ...

"भाई साहिब मुझे बहुत अफ़सोस है सत्तू के ना रहने का..मैं कुछ कर सकूँ तो आप .... " फोन पर झुकी आँखे रुक -रुक कर बोलती हैं ..
"बस लल्लन जो होना था हो गया... तू चिंता ना कर ऊपर वाला है ना... सुना है बहु के दोनों हाथ में चोट लगी  है प्लास्टर कब उतरेगा? देख तन्ने उसका ध्यान ना रखा तो मुझ से बुरा ना कोई.."

आँखे फोन पर झुकी जा रही है आठ हज़ार मील दूर उसी  सुबह को  बेटे के फूल चुग कर आई हताश चेहरे से आँखे चुरा रही है ... और फोन कुछ पलों के लिए गुंगा हो गया ...

फोटो - गूगल सर्च इंजन से

28 comments:

देवेश प्रताप said...

बहुत ही मार्मिक वर्णन ......ये पोस्ट पढ़ कर एक पल के लिए .....दर्द शब्द भी फीका लगने लगा .

दिलीप said...

dil bhar aaya..kitna marmik tha...

बेचैन आत्मा said...

मार्मिक.

sangeeta swarup said...

ओह ....बहुत मार्मिक...

Anonymous said...

accha laga padh kar, dil ko choo gaya,

anjule shyam said...

कभी लिखता नहीं दरिया, फ़क़त कहता ज़बानी है//कि दूजा नाम जीवन का रवानी है, रवानी है//बड़ी हैरत में डूबी आजकल बच्चों की नानी है//कहानी की किताबों में न राजा है, न रानी है//कहीं जब आस्माँ से रात चुपके से उतर आये//परिंदा घर को चल देता, समझ लेता निशानी है//

डॉ .अनुराग said...

सवाल किसी कहानी को बयां करने का नहीं है.उसे क्राफ्ट करने का है ....


जिसे नाक बहता छोड़ कर गए थे वो मोबाइल जेब से निकालता है...

ये क्राफ्ट है .....


एक बेहुदा मुस्कराहट पूछती है.... ये उसका विस्तार

पीतल के कटोरे में रखी बर्फी और समोसे के सामने बेन-शर्मन की टीशर्ट, केल्विन-क्लाइन की जींस, आँखों पर रेबंस का काला चश्मा, अपने से बड़े और छोटों का अपमान करने का दुस्साहर दे ही देते है...


.बुलेट .लल्लन .. ओर न जाने कितने किरदार .फिर मन में उतर जाते है ....


.......तीन चार बार ऐसा हुआ है के आपको पढने के बाद मन में जाने कैसा कैसा गुजरा है ....सच कहे तो हमें ये कहानिया भी नहीं लगती...असल सा लगता है

संजय भास्कर said...

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

सागर said...

अंत में तो यूँ हुआ कि रोंगटे खड़े हो गए... कब आई मेरे घर आप? और फिर हमने तो यह सब बताया भी नहीं था, कैसे जाना ??

मो सम कौन ? said...

आप का लेखन गज़ब का है। सच तो यह है कि पढ़कर मन में बहुत उमड़ घुमड़ होने लगती है।

राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ said...

क्या कहने साहब
जबाब नहीं
प्रसंशनीय प्रस्तुति
satguru-satykikhoj.blogspot.com

राजीव कुमार कुलश्रेष्ठ said...

क्या कहने साहब
जबाब नहीं
प्रसंशनीय प्रस्तुति
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Kishore Choudhary said...

जो खुशबू भीतर गहरे तक समाई हो उसका वर्णन करना मेरे लिए दुष्कर होता है ठीक यही हाल आपकी रचनाओं को लेकर है.
आपको पढ़ना पसंद मेरा पसंदीदा काम है. मुश्किल है कि इस रचना के बारे में क्या कहूँ ? इसलिए आभार सहित अनुराग जी के शब्दों से अपनी बात कहता हूँ
"सवाल किसी कहानी को बयां करने का नहीं है.उसे क्राफ्ट करने का है ...."
वाह बेहद उम्दा बात.

अरुणेश मिश्र said...

करुणापूर्ण ।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

डा अनुराग ने बहुत सलीके से बात कह दी है।

मुझे तो ये सारे किसी उपन्यास के टुकड़े लगते हैं…कभी-कभी लगता है कहीं नीरा जी कोई उपन्यास तो नहीं लिख रहीं? और बस बीच-बीच में हमें उल्झाये रखने के लिये ये टुकड़े पढ़वाती रहती हैं?

काश कि ये सच हो!

Manoj Bharti said...

आज बहुत दिनों के बाद आपको पढ़ रहा हूँ । मैं हमेशा आपक कथा शिल्प से प्रभावित रहा हूँ । इस कथा का शिल्प और शब्द विन्यास भी जबरदस्त है । ऐसा लगता है जो व्यक्ति संवेदनशील होता है, वह अपनी जन्मभूमि से दूर जाने पर अपनी जन्मभूमि और उससे जुड़ी बातों को बहुत गहराई से अनुभव करता होगा और आपकी हिंदी पर मजबूत पकड़ मुझे अचंभित करती है ... कई बार अज्ञेय की भाषा को देख कर मुझे जो विस्मय होता है, वही आपकी भाषा को देख कर भी होता है । सच आपका कहानी कहने का ढ़ंग अद्भुत और निराला है ।

अपूर्व said...

उफ़
रिश्ते अफ़ीम जैसे होते हैं..अक्सर उतने ही कड़वे मगर देर तक असर रखने वाले..और जिनकी लत हर इंसान को लगनी चाहिये..यही नशा जिंदगी को मुकम्मल बनाता है!!
.और क्या कहूँ..

tagskie said...

hi.. just dropping by here... have a nice day! http://kantahanan.blogspot.com/

अशोक सिँह रघुवंशी said...

मेरे पास शब्द नहीँ है अपने मनोभावोँ को प्रकट करने के लिए..............

योगेन्द्र मौदगिल said...

pahli baar pada aapko.....achha laga....khoj saarthak hui...

अक्षिता (पाखी) said...

लाजवाब लिखा आपने...मार्मिक वर्णन.


______________
पाखी की दुनिया में- 'जब अख़बार में हुई पाखी की चर्चा'

शोभना चौरे said...

aaspas hi to dekhte hai ye sab .
likhne ke liye ahsas jaruri hai jo aapne mhsoos kiye /
umda prstuti .

Safarchand said...

"और इस घर की इंटों में वो जिंदगी बसी है जो वहां रहते लाचार लगती थी और परदेस रहते आपार..."
अदभुद शब्द संयोजन से प्रभावशाली अभिव्यति. मेरी हार्दिक बधाई तथा इसी तरह लिखते रहने का आशीष.

भूतनाथ said...

mujhe to pataa bhi naa thaa....ki aise blog pa jaa rahaa hun....jahaan aankhe bheeg jaane vaali hain.....vaah.....

Vidhu said...

हैरानी नहीं हुई मुझे ये पढ़कर ....बहुत दिनों से नहीं थी आपकी पोस्ट के आस पास लेकिन पता था जब भी मिलूंगी ऐसा ही कुछ होगा जो उस दिन को दर्द में भिगो जाएगा ..एक सार्थक बैचैनी में लिखी गई आपकी ये पोस्ट ...शब्दों से परे है ...शुक्रिया

राजेश उत्‍साही said...

नीरा जी आपके ब्‍लाग पर विधु के ब्‍लाग से पहुंचा। आपकी यह रचना तो नहीं पर नीलिमा ने बादलों पर लिख दिया था बहुत अच्‍छी लगी। उसका अंत बहुत प्रभावी है। बधाई।

JanuskieZ said...

Hi... Looking ways to market your blog? try this: http://bit.ly/instantvisitors

भूतनाथ said...

kuchh kahanaa chaah rahaa tha main bhi beech talak....magar aakhir tak aate-aate main bhi goonga ho chukaa tha....theek tumhaare phone kee tarah....!!