Tuesday, 20 October 2009

नीले आसमान से स्लेटी बादल घुमड़- घुमड़ कर उसकी ओर आ रहे थे....



धूली धुप की तरह पीली, शीशे की तरह पारदर्शी, बरसात के टपकते पानी की तरह साफ़, अभी- अभी गिरी बरफ की तरह सफ़ेद, बिना बादलों के आकाश की तरह नीला, बिजली की रौशनी पहले और गड़गडाहट बाद, होटों से कही हाँ और ना, पन्नो पर पुते तथ्यों का आगाज़ ... वो जिंदगी को ऐसे ही देखता है ब्लेक एंड व्हाइट में.. पिछले तीन सालों से आजतक वृंदा को नहीं मालुम पुष्कर बीच के रगों को देखने में सच में ही असमर्थ है या वो उन्हें देख कर अनदेखा करना उसकी फितरत है ...
"तुम्हे कभी चिंता नहीं होती लोग हमारे बारे में क्या सोचेंगे.. कल रात तुमने फोन अपनी माँ को पकड़ा दिया " से हाय तो पुष्कर माँ ... तुम्हे मालुम है रात का एक बजा था उस समय!"
"तुम मुझे इतना देर से फोन क्यों करते हो? मेरी माँ बहुत साफ़ और खुले दिल की औरत है उसके पास तुम्हारी तरह फालतू बातें सोचने का वक्त नहीं .. क्यों अपना दीमाग खराब करते हो दुनिया के बारे में सोच कर?"
"तुम लड़की हो मुझे तुम्हारी बदनामी की चिंता होती है.."
"तुम्हे मेरी चिंता करने की कोई ज़रुरत नहीं है आई कन् लुक आफ्टर माइसेल्फ़... तुम अपने माता - पिता के आदर्श बेटे, कालेज के आदर्श विधार्थी और मेरे आदर्श दोस्त बने रहो.. यही तुम्हे सूट करता है"

वो किसी तरह से भी डाक्टर बनना चाहता है , यह उसके अलावा उसके माता - पिता का भी सपना है.. . ग्रेजुएशन के बाद भी लगा रहा, जब देश में दाखला नहीं मिला तो विदेश चला गया... जाने से पहले पुष्कर ने वृंदा के जन्मदिन पर उसकी ख़ुशी के लिए बहूत कुछ करना चाहा..वृंदा को उसकी दी ख़ुशी स्वीकार करने में कोई आपति ना थी लेकिन पुष्कर ख़ुशी बटोर कर उसके कदमो में डालना चाहता था और दुनिया के डर से उस ख़ुशी में शामिल होने से उसे एतराज़ था... व्रंदा ने जब उसकी दी ख़ुशी को स्वीकार करने से मना कर दिया तो उनकी अहम् की लड़ाई में दोस्ती कुर्बान हुई ... उस शख्स का क्या करे जो जिंदगी की दस्तक को अनसुना कर दुनिया के दिल टटोलता फिरता है ... फिर भी इंसानियत और शिष्टाचार की इज्ज़त रखना दोनी ने अपना धर्म समझा, जन्मदिन और नए साल पर वो एक दुसरे को शुभ कामनाएं भेजते रहे..

आर्किटेक्ट का लंबा कोर्स समाप्त कर व्रंदा एक प्रतिष्टित फर्म में नौकरी करने लगी ...
वृंदा ने भरपूर जिंदगी जी, उसने कभी अपनेआप को अकेला महसूस नहीं किया.. किसी से मिलने और अपनी जिंदगी में शामिल करने का कभी कोई अवसर नहीं गवाया... वह हर उन अवसरों और पार्टी में मोजूद होती... जहाँ किसी से मिलने की गुंजाइश होती, हर उस उम्मीदवार से मिली जिसको उसकी माँ ने चुना, आफिस की केन्टीन में आसपास मंडराने वालों पर भी वह उदार रही और कोई भी डेटिंग के किसी अवसर को उसने नहीं खोया... वो अलग बात है ... कुछ उसके कंधे तक आते थे, कुछ उसके आत्मविश्वास से घबराए, कुछ उसके फेमिनिस्ट विचारों से दूर भाग गए, कुछ ने उसकी आँखों की गहराई से ज्यादा पे पेकेट में दिलचस्पी ली, कुछ उसे फर्नीचर की तरह अपने घर में सजा कर रखना चाहते थे, कुछ एक दुसरे को जानने से पहले अपनाने को आतुर थे, तो कुछ सिर्फ गुड टाइम के लिए साथी बने , कुछ उसके सुंदर चहरे और कमसिन देह को छोड़ बाकी सब कुछ बदलना चाहते थे... उन सब की वह परिचित बनी, अच्छी दोस्त बनी, और कभी दूसरो ने उसे अजनबी बना दिया या कभी अनजाने में उसने...

पुष्कर को वापस लौटे साल हो चला है ... दोनों अपनी जिंदगी में मशगूल हैं ... वृंदा ने सोशलाइज़िन्ग के अलावा कई और शौक पाल लिए हैं जैसे हर तीन महीने बाद छुट्टियों पर जाना , हफ्ते में एक बार सालसा क्लास के लिए जाना, जन्मदिन और शुभ अवसरों पर दोस्तों और घरवालों के लिए खुद हाथ से ग्रीटिंग कार्ड बना कर देना, इतवार को ब्लाइंड स्कूल में जाकर अंधे बच्चो के साथ खेलना, शनिवार को कोचिंग स्कूल में पढ़ाना, इसके अलावा जो समय बचा फेसबुक और किताबों में मुह दे लेना .... उसके चेहरे की ताजगी और मन की चंचंलता समय के साथ निखरती रही, खुश रहने का तो उसे वरदान मिला था... वो जहाँ जाती जाने के बाद भी उसकी हंसी हवा में गूंजती ... जिंदगी का कोई ऐसा पल नहीं छोड़ा जो उसने जीया ना हो... जिन्दा पलों की चाबी उसकी अँगुलियों में हर समय झूलती...

कभी कालेज के दोस्त पुष्कर को लेकर मज़ाक करते तो वृंदा मुस्कुरा कर कहती "मैं चाहती हूँ उसकी खूबसारी गर्ल फ्रेंड हो जो उसके दिमाग से दुनिया का डर निकाल सके, वो मिस्टर सेक्रिफाईस से मिस्टर सक्सेसफुल बने... पार्टी में सबसे शर्मीली लड़की का हाथ थाम उसे डांस फ्लोर पर ला सके, अपनेआप को आईने में देख कर मुस्कुरा सके, आँखों से काला चश्मा उतार आसमान को देख सके, वो मुझे कहीं मिले तो कहे आई डोंट लाईक यौर मिस्टर राइट " ... और वह खिलखिला कर हंस देती ..

माँ कभी उदास होती तो वह गले में बाहें डाल, आखों में आँखे गडा कहती " अरे माँ तुम चिंता ना करो तुम अपने नातियों को अगले साल गोद में खिलाओगी ... वैसे तुम मेरे साथ कब रहना शुरू करोगी मेरी पलटन को कौन देखेगा जब मैं आफिस जाउंगी ..." दोनों की हँसी दीवारों से टकराती ...
उसके मोबाइल फोन पर दोस्त का एस एम् एस है ... पुष्कर मिला था, बरिस्ता में, तुम्हे जानकार ख़ुशी होगी वह अभी भी सिंगल है और उसकी कोई गर्लफ्रेंड भी नहीं है...
उसने खिड़की से बाहर फैले अँधेरे को देखा... आखों के रास्ते वो उसके भीतर और आस-पास उतरने लगा ... क्या अभी भी वो ब्लेक एंड व्हाइट जिंदगी जीता है? जीवन के रगों के प्रति कलर ब्लाइंड है ?... अपनी इच्छा को दराज में बंद कर दुनिया की ख्वाइशों में जीता है? ..इर्द -गिर्द बिखरे जिंदा पलों को अनदेखा कर पलकें मूंद लेता है ... धरकनो की आवाज़ में भी ट्रेफिक का शोर सुनता है, आज और अभी को ठुकरा कर कल और परसों में जीता है... इस अँधेरे से निकल भी ना पाई थी की सोचते-सोचते दुसरे अंधरे ने आँखों को घेर लिया और पता ही चला कब पहला अँधेरा उसे अकेला छोड़ खिसक गया ...
सुबह जब आँख खुली तो उसके मोबाइल फोन पर अनजान नंबर से दो मिस काल थे और एक अस ऍम अस ... मैं कल तुम्हारे शहर आ रहा हूँ तुम्हे डेट पर ले जाने... अपनी सभी डेट्स केंसल कर दो... पहुँच कर फोन करता हूँ ..पुष्कर
व्रंदा ने खिड़की से बाहर देखा नीले आसमान से स्लेटी बादल घुमड़- घुमड़ कर उसकी ओर आ रहे थे....
 
फोटो -flickr.com

Wednesday, 30 September 2009

एक शाम की भूख और पचास हजार की रोटी..



पता नहीं क्यों उसे लगने लगा है परिवार में उसका अस्तित्व ऐसा ही है जैसे शेल्फ पर रखी किताब का है, दीवार पर लगी घड़ी का है, मेज पर रखी चाबी का है, धुप में काले चश्में का है, बरसात में छाते का है, जाड़े में गर्म कोट का है ...वो सभी अमूर्त और अद्रश्य रहते हैं जब तक उनकी ज़रूरत नहीं पड़ती ... पर उसे किसी से कोई शिकायत नहीं है परिवार के सपने पूरे करने के लिए उसने अपने सपनों का साथ तो उसी दिन छोड़ दिया था जब कालेज की नौकरी छोड़, पत्नी के भाई के साथ बिजनेस शुरू किया था.. किसी के दबाव में आकर नहीं .... यह सब कुछ उसने स्वेच्छा से किया था...अपनों को खुश रखने और उनकी ख्वाइशे पूरी करने कि कोशिश में वह रेल के इंजन की तरह हो गया है उसमें खुद को झोंकता है और गाड़ी उसी और चलती है जहाँ पसिंजर जाना चाहते हैं ...उसके लिए यह सब अपनी पटरी, दिशा और स्टेशन की ओर चलने से कहीं अधिक आसान है ...


वह एक सप्ताह बाद बिजनेस टूर से लौटा है...घर के लोग उसके आगे- पीछे घूम रहे हैं पत्नी को याद करने कि फुर्सत उसे नहीं मिली थी किन्तु आज उसका अपनापन देख ग्लानी हो रही है... वह फोन पर भी कितना रुखा और उदासीन था ... ऐसा बहुत समय बाद हुआ है वह घर लौट कर अपनों के बीच खुश है आज ऐसा लग रहा है वह अपने घर नहीं किसी और के घर सात वर्ष बाद लौटा है... आज एक और विशेष बात है उसकी प्लेट में नौकर के हाथ कि नहीं बेटी के हाथ कि बनी रोटियां उड़न तश्तरी की तरह उतर रही हैं है, गोल नहीं है, अलग-अलग प्रान्तों के नक्शे हैं यह कश्मीर का नक्शा है सफ़ेद और मुलायम, यह उतरांचल का है थोड़ा उबड़- खाबड़ , यह पंजाब का लगता है कुछ ज्यादा करारा किनारों से थोड़ी मोटा, तोड़ने में सख्त है पर स्वाद में वाह ! आज बेटी इतनी बड़ी हो गई है और सबसे बड़ी बात यह कि वो रसोई कि तरफ मुडी है ओर पिता को गरम रोटी खिला रही है ... वो तीन रोटी खाता है किन्तु बेटी के आग्रह पर आज चार रोटी खाई हैं और रोटी के रंग, रूप और स्वाद की तारीफ़ वो खाना ख़त्म करने बाद भी करता रहा...

वो जेब में हाथ डाल रहा था.. फिर अचानक पूछ बैठा...

"बरखा बेटा! कुछ देना चाहता हूँ?"

"नहीं पापा! कुछ नहीं चाहिए! "

उसके जवाब से वह और उदार हो गया और बोला "तुम्हारा मोबाइल ठीक से चार्ज नहीं होता, जन्मदिन से पहले ही तुम्हें नया मोबाइल दिला दूंगा "

बरखा का चेहरा और आँखे चमक उठी "पापा मैंने पांच हजार तो जमा कर रखे हैं बाकी आप दे देना .. मुझे आई-फोन चाहिए, बिजनेस टूर पर आप जब सीन्गापुर जायेंगे तो वहां से लेकर आना "

"ठीक है ... मुझे तुम्हारे हाथ कि रोटी पहली और आखरी बार तो नहीं मिल रही न?" दोनों जोरों से हंस दिए..


सोने से पहले उसका सेल फोन बजा.. उसे ख़ुशी हुई उदित का फोन है.. नहीं तो वह मोबाइल का बिल बचाने की वजह से वह घर वालों से ही उम्मीद करता है ...
"बेटा कालेज कैसा चला रहा है ?"

"पापा फर्स्ट क्लास "

"कालेज के अलावा क्या हो रहा है?"

"पापा मैं आजकल रोटियां बनाना सीख रहा हूँ जब छुट्टियों में घर आउंगा तो आपको अपने हाथ कि रोटी खिलाउंगा .."
"तू फ़िक्र मत कर मैं तेरे हाथ कि रोटी बिना खाए ही तेरे अकाउंट में रुपये डाल दूंगा... " उसने हंस कर कहा ...

"पापा दस हज़ार चाहिए....मुझे कालेज के फंक्शन....." .

"कल ही डाल दूंगा उसने बात काटते हुए कहा...ज्यादा कि ज़रूरत हो तो बताना.."

"नहीं पापा काफी होंगे.. पर मैं आपको अपने हाथों से रोटी बना कर जरुर खिलाउंगा.. "

दोनों हंसते हुए एक दुसरे को बाय कहते हैं ....  


"अरे यह क्या?" पास बैठी पत्नी बोली? उसने हैरानी से उसकी तरफ देखा...

"मैंने तुम्हारे लिए बीस साल तक रोटियां बनाई ... तुमने मुझे क्या दिया?"

"अरे! सब कुछ तुम्हारा ही तो है...."

"बस! हमेशा कि तरह हवा में बात! ...."

"ठीक है तुम्हें क्या चाहिए? "

"सिर्फ एक हीरे कि अंगूठी "

"बीस साल के सिर्फ बीस हज़ार... कल केश ला देना"

वह हंस कर बोली उसके चेहरे कि फीकी सी मुस्कान ने पत्नी की हंसी का साथ दिया...


उसे यकीन हो गया वह होटल से अपने घर लौट आया है...

अब उसे किसी के हाथ की रोटी खाने कि इच्छा नहीं होती ... नौकर के हाथ की रोटी अच्छी लगती है क्योंकि उनमें नोटों की महक थोड़ी कम आती है...

फोटो- गूगल सर्च इंजन से   

Thursday, 17 September 2009

उनकी नीली आँखों में अनगिनत किरणों की रौशनी....



समुद्र कि लहरें उनके पाँव को चारों तरफ से चूमती हैं..उनकी घुटनों तक मुडी जींस को छू कर लौट जाती हैं उन्हें दोबारा भिगोने के लिए ... समुद्र ने सूरज को अपने भीतर छुपाने से पहले हाथों में ऊपर उठा रखा है ताकि सब उसे गौर से देख लें...आज की तारीख का सूरज देखने का यह आखरी मौका है... उसका रंग पीले से नारंगी हो चला है .. पर्यटक अपनी चटाई, तौलिये, फ्लास्क, छतरी, सेंडविच बॉक्स समेट रहे हैं ... घोड़ेवाला बच्चों को घोड़े पर आखरी सवारी दे रहा है ... आइसक्रीम वाले के पास अब सिर्फ वेनीला और मिंट फ्लेवर की आइसक्रीम बची है, तट पर चार पांच साल का लड़का रेत का महल पेरों तले रोंद कर खुश हो रहा है और उसकी बड़ी बहन उसकी दीवारें और छत बचाने कि कोशिश में उसे धक्का दे रही है.... उनकी माँ चिल्ला रही है उसे रोंद लेने दो वैसे भी लहरें बहा ले जायेंगी यह महल... तट पर हलचल कम होने लगी है तो सामने सड़क पर बढ़ गई है और सड़क के उस पार दुकानों पर दिवाली जैसी जगमगाहट है ... 
 

रेचल पहली बार अपने गाँव से बाहर निकली है उसका गाँव यहाँ से अस्सी किलोमीटर कि दूरी पर है, इससे पहले उसने चहल- पहल गाँव में हर रविवार लगने वाले बाज़ार में देखी है यहाँ पहली बार उसने समुद्र और शहर कि जगमगाहट देखी है गाँव में एक ही बेकरी है रेचल उसमें काम करती है जहाँ पर हर रोज राबर्ट लंच टाइम में सेंडविच और केक खर्रेदने आता था ... रॉबर्ट गाँव से बाहर एक ऊन की फेक्ट्री बन रही है उसमें क्रेन चलाने का काम करता है उसे पढाई छोड़ देनी पड़ी क्योंकि सोलह वर्ष के होते ही उसके पिता ने खर्चा देने से इनकार कर दिया ...


रेचल को जो भी सीपी नज़र आती है वो उठा लेती है और उसे रॉबर्ट कि कमीज़ की जेब में डाल देती है... उसके क़दमों के साथ सीपियाँ छनक रही हैं पार्श्व में लहरों का संगीत सातवें स्वर में उनका साथ दे रहा है ढेर सारा जीवन बिखरा पड़ा है गिले रेत पर पाँव के निशाँ में, लहरों में उबलते बुलबुलों में, हवा के साथ डोलते जहाजों में, नीले पानी में घुलती किरणों कि लाली में, आकाश में उड़ते परिंदों कि कतारों में, सड़क पर झिलमिलाती रौशनी में, केफे से उड़ती मछली कि महक में, एमुज्मेंट की मशीनों से आते शोर में .... वे समेट रहे हैं यह जीवन रेत में पड़ी सीपियों के साथ अपने ख़्वाबों में ....


दोनों थक कर बेंच पर बैठ जाते हैं .... रेचल का गुलाबी रंग नारंगी रौशनी में चमक रहा है दोनों की नीली आँखे डूबते सूरज की अनगिनत किरणों को सोख रही हैं .... रेचल ने अपना सर रॉबर्ट के कन्धों पर टिका लिया है दोनों की उम्र उनीस वर्ष है यह उनके हनीमून का आखरी दिन है... उनकी आँखों में वो सभी ख्वाब दस्तक दे रहे हैं जो प्यार के समुद्र में गोता लगाने आसमान से उतर कर आते हैं फिर नींद में बस जाते हैं ... उन्होंने फैसला किया है उनके कुछ ख्वाब नींद से ज़मीन पर उतरेंगे ... वह शादी कि पच्चीसवी सालगिरह यहीं मनाएंगे इसी तट पर, इसी बेंच पर, यहीं सूरज के सामने ... वह दो बच्चे अगले दो वर्ष में पैदा करेंगे...उन्हे एक साथ पाल-पोस कर बड़ा कर... वह रेचल का दुनिया घुमने का सपना पूरा करेगा ... वहां से लौट कर वह यूनिवेर्सिटी में दाखला लेगा और डिग्री की पढ़ाई पूरी करेगा ....



आज वो दोबारा से उसी बेंच पर बैठे हैं राबर्ट के माथे के ऊपर से सर से कुछ बाल उड़ गए हैं और रेचल के बाल कुछ ज्यादा सुनहरे हो गए हैं एक वर्ष पहले उनका तेईस वर्षीय बेटा माइकल इराक़ कि लड़ाई में मारा गया.. वह पेट्रोल से भरी लारी चला रहा था जिस पर किसी ने हेंड ग्रेनेड फेंक दिया...बेटे कि जगह उन्हे सरकार से कुछ पैसे, उसका सूटकेस और उसके दोस्तों से आखिर के दिनों में खींचे फोटो मिले ... उसकी गर्भवती पत्नी एलिक्स को गहरा सदमा लगा छ महीने  बाद बेटे के जन्म के समय उसे ब्रेन हेमरेज हो गया.... उनकी बेटी लिज़ जो माइकल से एक साल बड़ी है बचपन में दादा के फार्म पर जाकर रहा करती, उसके दादा ने उसका यौन शोषण किया, उस दर्द से छुटकारा पाने के लिए उसने हिरोइन का सहारा लिया, जब वो माँ बनी उसे बच्ची के पिता का नाम तक ना मालुम था... अपनी बच्ची को वह बहुत प्यार करती थी .. अपने आप को काबिल माँ बनाने के लिए वह एक वर्ष रिहाब में रही....फिर भी सोशल सर्विस ने बेटी को चिल्ड्रेन होम से माँ के पास नहीं लौटने दिया .. लिज़ वर्तमान से दूर भागने के लिए फिर से जाने- पहचाने पुराने रास्तों की तरह मुड़ ली ... राबर्ट और रेचल को नातिन की कस्टडी के लिए कोर्ट में केस करना पड़ा जिसे वह दो साल बाद जीत गए....



आज भी चारों तरह बहुत सारा जीवन बिखरा पड़ा है राबर्ट कि गोदी में एक जीवन आँखे मूंदे दाये हाथ का अंगूठा चूस रहा है और दुसरा जीवन रेचल और रॉबर्ट के बीच बैठा बाये हाथ की अंगुली उठा -उठा कर मुश्किल से मुश्किल सवाल पूछ रहा है जिसका वो बारी - बारी मुस्कुरा कर जवाब दे रहे हैं ... आज भी समुन्द्र उनके पेरों को चूम रहा है, सूरज को उसने हाथों में उठा रखा है ... राबर्ट के हाथ रेचल के कंधे पर है उनके सपने भले ही फिर से पचीस साल के लिए सूरज के साथ समुद्र में छिप गए हैं किन्तु पचीस साल पहले किया सूरज और समुद्र से इस बेंच पर मिलने का वादा उन्होंने निभाया है... आज भी उनकी नीली आँखों में अनगिनत किरणों की रौशनी है जो उन्होंने दशकों पहले सोखी थी .. 
 
फोटो - गूगल सर्च इंजन से

Thursday, 3 September 2009

"आई हेड ए वेरी लांग डे!....."


उसकी आँख खुली और घड़ी की और मुड़ गई... कमरे के भीतर अँधेरा वैसा ही बिखरा पड़ा था जैसे सोने से पहले था... इस मौसम में सूरज का अलार्म बजने से कोई लेना-देना नहीं है और ना ही सूरज ने रौशनी देने की गारंटी दी है की वह स्कूल और आफिस बंद होने तक रौशनी देता रहेगा... बिना चमक के, बिना पीले रंग के, बिना ऊष्मा के वह बादलों के पीछे छुप कर भी अपने होने का अहसास दिला देता है ताकि दिन और रात पर उसका विश्वास कायम रहे.. ...

उसके दिमाग का अलार्म अक्सर घड़ी के अलार्म को हरा देता है और आज भी यही हुआ... शरीर रजाई से बाहर निकालने कि इजाज़त मांग रहा है जो उसे रोज़ कि तरह नहीं मिलती...हाथ पैरों को दीमाग का आदेश जरूर मिल जाता है जिसे वो कभी नहीं ठुकराते... एक झटके से रजाई पलंग के दूसरी तरफ फेंक... बैठ जाती है उसके पाँव स्लीपर तलाशते हैं वो गाउन लपेटती हुई दुसरे कमरे में झाकती है... रजाई का ढेर ज़मीन पर कुंडली मारे बैठा है.. उसके ऊपर स्पाइडर मेंन सो रहा है और सुपरमेन घुटने पेट में दिए , पलंग के किनारे बिस्तर की चादर के नीचे सिमटा पड़ा है यदि वो जरा सा भी हिला तो बेचारा स्पाइडर मेंन उसके भार तले दब जाएगा ...वो अपने कमरे से गर्म रजाई ला उसके पाँव, कमर, पेट और कन्धों के नीचे दबा देती है ...चार वर्ष के सीखियाँ पहलवान, सुपरमेन की हड्डियों के नीचे रजाई टेंट कि तरह तन गई.. उसके ठंडे नर्म गाल पर अपनी गर्म हथेली रख दुसरे हाथ से स्पाइडर मेंन उठा वही पास के स्टूल पर टिका देती है .. उसकी नज़र सुपरमेन के मासूम चेहरे पर टिकी है बाल काटने के बाद उसके कान कितने बड़े लगते हैं सुपरमेन का विरासत में मिला नाम इसके कान के अनुरूप है "कपिल"...

रात दोनों तय करके सोये थे सुबह क्या करना है समझोता मज़बूत करने के लिए उसने बकायदा रिश्वत दी है... सोने से पहले दो कहानी ज्यादा सुनाई थी... वापस लौटने के बाद मेक्डोनाल्ड में बर्गर और शाम को "हल्क" फिल्म ... और इस नेगोसिअशन के दौरान उसके नन्हे से मुख से निकले शब्द ... परहेप्स... इनडीड... ..फॉर एक्साम्पल....एब्सोलुत्ली.. बट... बिकाज़.... लेट मी थिंक... इट्स नाट फेयर....लेट मी पुट दिस वे.... . नींद आने के बाद तक भी उसके कानों में तैरते रहे... उसने डेढ़ घंटे के भीतर पंद्रह वर्ष अनुभवी बेटियों की माँ कि वो सभी धारणाएं और ग़लतफ़हमीयाँ दूर कर दी जो उसने बेटों के पालने के बारे में पाल रखी थी. .

किताब और तौलिया उठा वह बाथरूम में घुस गई ... जब गीले सर बाहर निकली तो पर्दों के बीच से छनती रौशनी अंदर और बाहर से मिटते अँधेरे का ऐलान कर रही थी...अँगुलियों ने परदे का कोना पकड़ा और जोर से खींच दिया ...परदों कि रेलिंग और रिंग्स के बीच बजती खनक के साथ उसने कमरे में झाँका.. रजाई के टेंट में कोई हलचल नहीं हुई ...सुपरमेन के कमरे में आकर भी यही किया... कमरे में बिखरे उजाले और परदों के खिसकते से सोने वाले कि आँखों का कोई सरोकार ना था ...उसने खिड़की से बाहर झांका ... सूरज बिना दिखे भी आकाश का रंग बदल रहा है ...घास ने स्लेटी रंग कि चादर ओढी है ....मोर पंखी के पेड़ सावधान कि स्थिति में खड़े हैं पेड़ पर चिड़िया सेव कुतर रही है पेड़ के नीचे ऐसे ही कुतरे हुए कुछ सेव पड़े हैं.. पीछे के घरों की कतार में एक घर के भीतर बती जल रही है और उस घर के सामने से एक बस गुजर रही है उस बस के अलावा सुबह कि शान्ति अपनी पूरी तरंग से विराजमान है जिसे वह हेयर ड्रायर लगा बड़ी बेहरहमी से कुचल देती है.... वारड्रोब का दरवाजा खोलने और आज कि डायरी के पन्ने का आपस में गहरा सम्बन्ध है उसने काली गर्म पतलून, सफेद और काली बारीक धारी का पूरी आस्तीन का ब्लाउज और पतलून के साथ की मेचिंग जेकेट... मौसम के साथ-साथ कलर और कलर कोर्डिनेशन बोर्ड रूम की मांग भी है...

ड्रेसिंग टेबल के सामने मोस्चराइजर की ट्यूब दबाते हुए वह आवाज़ लगाना शुरू करती है .. उसके हाथ रजाई के टेंट को आगे पीछे हिला रहे हैं और चार-पांच बार हिलने के बाद सुपरमेन का मासूम सा चेहरा बिना आँखे खोले तकिया छोड़ हवा में झूल रहा है उसकी छाती पर चिपका सुपरमेन टी शर्ट की सिलवटों से निकलने कि कोशिश कर रहा है अचानक उसकी आँखें खुली दो बल्ब टिमटिमाये .. जैसे वो कभी सोये नहीं थे .. "बुआ आई फाउंड माई मिंटू" ... "मिंटू कौन?"... " माय लोस्ट रेबिट..हाओ केन यू फोरगेट मिंटू बुआ?".... .. .. वो अपनी नन्ही- नन्ही हथेलियों को हवा में उछाल कर, बंद- खोल कर उसे समझा रहा है ..."आई वाज़ चेजिग हिम आल नाईट.".. "वन मोमेंट ही वाज़ इन माई हेंड... अदर मोमेंट ही वाज़ गान" ... वो बिना पलक झपके बोल रहा है मुख से ज्यादा उसकी मोटी- मोटी आँखें बोल रही हैं उनमें तैरता हुआ मिंटू एक्वेरियम में मछली की तरह साफ़ दिख रहा है .... वह अपनी कलाई उठती है और आँखें भागते समय को पकड़ती है... इससे पहले वो कुछ कहे वह मुह खोल..आँख बंद कर.. जम्भाई और अंगडाई लेता हुआ धीरे से बुदबुदाता है "आई हेड ए वेरी लांग डे!....." और जिस तेजी से उसका चेहरा तकिये से हवा में उछला था उसी तेजी से वह चेहरा तकिये पर आखें मूंदे पसर गया है और सुबह की रौशनी में कमल की तरह खिल उठा है ... उसके होठ उसके गालों को चूमते हैं...

वह दो फोन लगाती है एक अपनी पी ऐ को और एक बेबी सीटर को... कपड़े बदल वह धीरे से उसकी रजाई में सरकती है.. आँखे मूंद आहिस्ता से उसके सपने में झांकती है रजाई के भीतर कस के सुपरमेन का हाथ पकड़ लेती है... आज वह दोनों मिंटू को पकड़ कर ही रहेंगे...

foto from - www.karanfincannon.com

Friday, 21 August 2009

गंगा को एक न एक दिन तो थेम्स नदी बनना ही था.....

पता नहीं क्यों उसे लगता था अपने खून के कतरे से वो उसी तरह वाकिफ है जैसे अपने आँखों के रंग से, ठोडी के नीचे पड़े निशाँ से, हाथों पर उभरती नसों से, कलाई पर घडी के नीचे गोलाई में पड़े घेरे से, बालों में उम्र दर्ज करती स्लेटी चमक से, दीमाग में रोज के लिए लिखी टू-डू लिस्ट से, शाम को दबे पाँव आकर पैरों से लिपटती थकान से, रात को सोने से पहले कुछ देर किताब के पन्ने पलटने की तलब से, समय-असमय अतीत कुरेदती यादों से.....बाहर से तो अब भी वह लाल नज़र आता है किन्तु भीतर से कब में वो सफ़ेद हो गया?...अब तो सफ़ेद उजले पंख भी निकल आये हैं उसके...आसमान के नीचे ज़मी पर सभी छोटे और पिछड़े नज़र आते हैं.. ..

मोटी- मोटी आँखे, लम्बी गर्दन, गोल चेहरे पर नीचे निकली तिकोनी ठोडी, लंबी मोटी नाक कोई एक को देखकर दूसरी को पहचान लेता है ... जो पाँव बचपन में अंगुली पकड़ दोड़ते थे अब बड़े होने पर नाट्यडव और अडव सीखने के लिए होम वर्क छोड़, चूडीदार पहन उसका इन्जार करते और वो शाम को आफिस के बाद रसोई छोड़ टेक्सी किया करती, उसे उतार कर कम्यूनिटी सेंटर के कार पार्क में आफिस की फाइल को पहले तो बिना खोले घूरती फिर खोल कर... दोनों दबे पाँव घर घुसती... अपराधियों की तरह... कहीं यह सुनने को ना मिल जाए "भरत नाटियम सीखना जरूरी नहीं है पढ़ना जरूरी है"... हाई स्कूल में उसके साथ की लड़कियां पता नहीं क्या क्या कर रही हैं वह तो कभी - कभी सहेली के जन्मदिन में जाने की इजाज़त मांग रही है.. इतवार को मंदिर में कल्चर क्लास, बुधवार को कम्यूनिटी सेंटर में हिंदी और शुक्रवार को गुरूजी के घर क्लास्सिकल डांस..... वह सिर्फ उन लोगों के घर स्लीपोवर कर सकती है जिनके घर के किसी कोने में मूर्ति है या गुरुनानक का कलेंडर है... स्कूल की छुट्टियों में आत्मीयता और दुलार से भरी रिश्तों की छत पर दून घाटी में खुशबू बटोरने का टिकट हर साल....

दो संस्कृति के बीच रहना रस्सा खीचने के खेल के समान है आखिर जीत तो उन्ही की होगी जिस तरफ हाथ ज्यादा हैं जिनके पाँव के नीचे की ज़मी अपनी है हवा अपनी है आसमान अपना है ...वैसे भी किन्डर गार्डन से मैं मैं.... मैं... "सिर्फ मैं" के मन्त्र के सामने शाम की आरती की घंटी की आवाज़ हवा में गुम होनी ही थी... भेड़ के झुंड में भी अपनी अलग पहचान बना कर उनके साथ चलना सीखा सकती है, हजारों मील दूरी से भी अपने जड़ों की मिटटी की खुशबू सूंघा सकती है बेमौसम, बेहिसाब पड़ती बरफ, बिजली, आंधी से बचा सकती है... किन्तु वह उसे इतिहास के हर कोनो में अन्याय को न्याय, जुल्म को खिदमत साबित करती और स्वयं को दुनिया में सर्वेश्रेष्ठ घोषित करती मखमली ज़मी की फिसलन पर चलने से, गिरगिट की तरह रंग बदलते आकाश की चकाचक रौशनी को सूरज मान लेने से... बर्फीली, शुष्क, हड्डियों को भेद आत्मा को सुन्न करती हवा में सांस लेने से नहीं रोक सकती ... संवेदनाओं और भावनाओं को काफी में मिला कर नहीं पिला सकती..

हमेशा से घर की चौखट के बाहर सब पराया था... सड़क, पगडण्डी, घास, रौशनी, अँधेरा, बर्फ, आकाश, लेम्प पोस्ट, घड़ी की सुइयां, आचार- व्यवहार, मूल्य, आहार, चेहरे, शब्द, जुबान, संगीत, आलाप, भगवान् ... अब ऐसा क्यों लगता है चौखट के भीतर की छत, नींव और दीवारें भी पराई हो गई हैं ...क्या उसे मालुम नहीं था उदर की गंगा को एक न एक दिन तो थेम्स नदी बनना ही था.......

फोटो- गूगल सर्च इंजन से

Friday, 17 July 2009

कन्वेयर बेल्ट पर उगता अपनी माटी का सोना...

फ्लाईट आये घंटे से ऊपर हो चला था पर उन दोनों का कहीं अता-पता न था... उनके आने की ख़ुशी में उसे ढाई सो मील के सफ़र का पता न चला, पर अब मंजिल पर पहुँच कर एक- एक मिनट घंटो से कम नहीं... वो उसके घर पहली बार आ रहे थे... पिता को तो एतराज़ ना था किन्तु उनकी सरकारी नौकरी इजाजत नहीं देती बेटी के घर महीने भर से ज्यादा रह सकें और माँ को उनका बेटी की माँ होना रोकता था.. चलो दोनों आने को तो राज़ी हुए महीने भर को ही सही.... जिन बातों को अब तक वह चिठ्ठी और फोन पर बताती रही है वो खुद देख लेंगे जैसे सूरज का धरती से अक्सर नाराज रहना और बादलों को धरती से हद से ज्यादा प्यार करना... हर मोसम में जमीन के हर कोने में घास का धुल -मिटटी को जकड़े रहना... टायरों की चीख के बीच शमशान की शांति का सड़कों पर पसरे रहना.. बेचारे गीले कपडों को धुप नसीब ना होना उनका लांड्री की मशीनों में भभकती भाप में झुलसना... पानी के लोटे का बाथरूम के फर्श को तरसना, लोटे से पानी उड़ेल खुल कर नहाने पर पाबन्दी होना... हवा की नमी को विंड स्क्रीन पर सेलोटेप की तरह चिपक जाना और स्क्रेपर के साथ मिल कर बेहूदा आवाज़ निकालना... गाड़ी का पेट भी उसमें से निकल कर खुद भरना.. अनजान बच्चों का सड़क पर चलते चलते "पाकी" बुला कर अभिनन्दन करना...यदि आप सही और गलत वक्त पर थंकयू और सारी न कह पाए तो प्यार भरी आँखों के तीर के दर्द को अपनी नासमझी समझ कर भूल जाना ...

अब उसकी आँखे और कमर दोनों जवाब देने लगे थे ... वो सभी यात्री आने बंद हो गए थे जिनके सूटकेस और बेग पर एरो फ्लोट के टेग हों... कहाँ हो सकते हैं टायलेट में भी इतनी देर तो नहीं लग सकती .. इन्कुआरी पर यह उसका तीसरा चक्कर था ... वो फ्लाईट लिस्ट चेक कर के उसे उसे बता चुके हैं उनका नाम लिस्ट में है... उसका सयम टूटने और चिंता बढ़ने लगी थी...

वह समय की गंभीरता को हल्का- फुल्का बनाने और उसके माथे पर चिंता की लकीरों को गालों के गढों में बदलने के लिए अपने होंठों को उसके कानो के नज़दीक ला धीरे से फुसफुसाया...

"वो कहीं रशिया में अपने दुसरे हनीमून के लिए तो नहीं उतर गए..." और ही.. ही करने लगा... उसने घूर कर उसकी और देखा... ऐसे अवसरों पर उसका सेंस आफ हयूमर उसे चूंटी की तरह काठता है " बिना उससे कुछ बोले वह इन्क्वारी की तरफ बढ़ गई...

वह इन्क्यारी पर गिडगिडा रही है क्या वह बेगेज़ क्लेम तक जाकर उन्हें देख आये.. अब डेढ़ घंटा हो चला था... वो एक स्कुरिटी स्टाफ के साथ उसे अन्दर भेजने के लिए तैयार हो गए ... वह उसके आगे -आगे हो ली... डिपारचर लांज को पार कर साड़ी और पेंट, कमीज़, कोट में दो पहचाने चेहरों को ढूंढने में उसे ज्यादा समय नहीं लगा, वैसे भी वो अकेले ही थे कन्वेयर बेल्ट के पास ... कन्वेयर बेल्ट खाली थी उनके सूटकेस ट्राली में थे ... तभी उसे नजर आया कन्वेयर बेल्ट पर चावल का ढेर उग आया है जैसे ही वह ढेर उनके पास से गुजरता है ... चार हाथ बढ़ कर उस ढेर को बेग में उड़ेल रहे हैं और इन्जार करते हैं धरती के घूमने और सफ़ेद ढेर का फिर पास से होकर निकलने का... वह भाग कर पीछे से जाकर दोनों को बाहों भर लेती है वो तीनो एक दुसरे के कंधे भिगोते हैं...नाक से सू.....सू करते हुए मुस्कुराते हैं एक दुसरे को टीशू पास करते हैं माँ उसे ऊपर से नीचे तक देखती है और शिकायत करती है..

"तू ऐसी की ऐसी... ना सावन हरे ना भादों... लगता नहीं आखरी महीना है कभी तो लगे बिटिया ....." तभी सफ़ेद ढेर पास से गुजरता है वह भी हाथ बढाती है ... माँ पकड़ कर झिड़क देती है "ऐसी हालत में झुकना ठीक नहीं... तू बस खड़ी रह... बहूत थकी लगती है"..

पिता को कहती है सूटकेस उतार दो बैठने के लिए... वह माँ को क्या समझाए ऐसी हालत में वो यहाँ क्या नहीं करती...
" कहा था न इन्हें सूटकेस में भर लेते हैं" माँ शिकायत के लहजे में बोली..

"अरे! मैंने कौनसा मना किया था" पिता झल्ला कर बोले...

"अब क्या फरक पड़ता है वो बेग में थे या सूटकेस में" वो हमेशा की तरह दोनों के बीच रेफरी बनी
वो दोनों से जिद करती है वहां से चलने की ..

"रहने दो... माँ बहूत अच्छा बासमती चावल मिलता है यहाँ"...

"पर यह देहरादून का बासमती चावल है..."
वह स्कुरिटी स्टाफ की तरफ देखती है वो उसकी तरफ देख कर मुस्कुराते हुए सर हिलाता मुड़ जाता है ...
वह पहाड़ों के बीच घाटी में खड़ी है उसके चारों तरफ धान के खेत हैं वह मुस्कुराते हुए देखती रहती है चार हाथ बड़ी तमन्यता से अपनी माटी का सोना बेग में भर रहे हैं..

उनके हाथों से गुजर अनगिनित सफ़ेद दानों की महक उसके ज़हन में हमेशा के लिए बसने जा रही है...
फोटो - गूगल सर्च इंजन से

Tuesday, 7 July 2009

उसका बेलेंस हमेशा के लिए माइनस में....

वो दोनों केफे में बैठे हैं बहस कर रहे हैं बहस क्या सिर्फ वही बोल रही है वह चुप है या बीच -बीच में मुस्कुरा देता है आसपास के लोग आँखे बचा उसका लाल और हताश चेहरा पढ़ रहे हैं यह काफी का तीसरा कप है और केफीन उसके भीतर की उथल - पुथल को संतुलित करने के बजाये उसे और उष्मा दे रही है वह उसके लिए पानी मंगाता है उसका मन करता है पानी को गले में नहीं अपने सर पर उडेल ले .... इतने बरसों से उसे जानने के बाद भी उसे लग रहा है आज वह किसी अजनबी के पास बैठी है जैसे पहली बार मिल रही हो ... .... उसके दीमाग में उपजने से पहले, कोई भी भ्रम को उसका विशवास उन्हें विंड स्क्रीन पर पड़ी बारिश कि तरह वाइपर से पोंछ देता था उसने एक बार भी नहीं पूछा क्यों इस बार मुझे जल्दी जाने को क्यों कह रहे हो... ? प्यार और विशवास उसकी ख़ुशी के केडिट कार्ड का पिन नंबर था वह सालों से उसे कहीं भी, किसी भी समय केश करा सकती थी... अब उसका बेलेंस हमेशा के लिए माइनस में........

वो बार - बार कह रही थी... "तुम मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकते हो? " .. "यदि ऐसी बात थी तो क्यों आने को कहा...क्या इमानदार होना इतना मुश्किल था.... कोई बहाना बना सकते थे नौकरी का, छुट्टी का, तबियत का, हालात का... जरूरी तो नहीं था मुझसे मिलना " ... वो थक गई थी, हार गई थी उसका मौन उसे तोड़ रहा था कुचल रहा था... वो हार कर फिर कहती है "हाव कुड यू ......"

उसने अपना मौन तोड़ा और मुस्कुरा कर कहा "तुम बेवजह भावुक और पोजेसिव हो रही हो ...... आई वोंट माइंड इफ यू स्लीप विद यौर एक्स और सो..... "

उसे लगा आसमान से पत्थरों कि बारिश हो रही है सारे पत्थर उसके सर पर गिरे हैं.... वह केफे से बाहर निकल आई ... बस स्टाप पर खड़ी भीड़ उसे घूर रही है ... वह साड़ी के पल्ले को गले और दोनों बांहों पर लपेट लेती है फिर भी लगा द्रोपदी के चीर की तरह कोई उसकी साड़ी खींच रहा है... धुप, सूरज, आसमान में उड़ता हवाईजहाज, मिटटी में उभरे जूतों और साइकल के पहिये के निशाँ, खम्बा, बिजली कि तारें, ट्रेफिक, दीवार पर चिपका पोस्टर, इधर उधर पड़ा कचरा और खाली बोतलें, सड़क के उस पार बने क्वाटर, रूकती बस और उड़ती धुल.. सभी उसके चारों तरफ घूम रहे हैं गले में एक बड़े धक्के के साथ काफी बाहर आ गई... यकायक सभी कुछ घूमता हुआ स्थिर हो गया... उसके भीतर का कोलाहल भी इस स्थिरता को थामना चाहता है वह पल्ले से अपना मुह साफ़ करती है और पहले से भी तीव्र काफी की गंध के साथ केफे के अन्दर आती है उसके सामने अपनी पुरानी जगह आकर बैठ जाती है और अपने आपको फिर से विशवास दिलाती है उसने सही सुना है...

"एक बात बताओगे .."

"क्या..." वो उसकी और देखता है

"क्या तुम अपनी पत्नी से भी यही कहते? " वो उसकी आँखों में आँखे डाल कर पूछती है

वह एक लम्बी सांस खींच टेबल पर रखे ग्लास को घूर रहा है उसकी खामोशी पहले की भांति जवाब देती है..

वह सामने रखा ग्लास को एक सांस में खाली कर अपने चारों तरफ देखती है उसकी नज़र सामने कि टेबल पर बैठे अधेड़ उम्र के आदमी के साथ सटकर बैठी यूवा लड़की पर पड़ी जिसने बेहद कसी जींस, बिना बाजू और नीचे गले का भड़कीला ब्लाउज पहना हुआ है यूवा लड़की से उसकी निगाह मिलती है वह उसकी और देख लगातार मुस्कुरा रही है....

Painting - Van Gogh