Friday, 15 April 2011

एक्सपाइरी डेट के बाद भी दूर नहीं होना चाहते ...

वो खुशी में स्फूर्ति से और उदासी में फुर्सत से उसके हम सफ़र रहे हैं उन्होंने देखा है उसे देवदार की कतारों के पीछे किसी को ढूंढते हुए... मैदान में घोड़े को घास से दोस्ती करते हुए... तलवों के छूते ही सूखे पत्तों को चरमरा कर शर्माते हुए, पत्तों का फूटपाथ का घूंघट बनते और निर्लज्ज हवा का सभी के सामने वह घूँघट उघाड़ते हुए... घर लौटते परिंदों को दाने के तलाश की कहानी आसमा को सुनाते हुए... चिमनी से निकलते धुएं की महक को दिल से निकले धुंए से पहचान बढ़ाते  हुए ... जंजीर से मुक्त होने को गर्दन खींचते  अल्सेशियन को देख अपनी खैर बचाते हुए... हाथ में हाथ लिए  झुर्री दार चेहरे की मुस्कान का अभिवंदन करते हुए... नुकीली छतों पर से पिघलती बर्फ का रंग उसके गालों पर लुढ़क आये पानी के रंग से मिलते हुए... घोड़े की कमर पर ऊपर-नीचे उछलती छाया को  टप -टप की आवाज़ के साथ दूर जाते हुए... किसी अजनबी गेट पर गुब्बारों का बार -बार सर हिला उसका स्वागत करते हुए, दोड़ते हुए बहरों के आई पोड्स को जगह देने के लिए सड़क पर उतरते हुए...  जानी-अनजानी आँखों का खेत की बगल में  रोज उसी वक्त मोड़ पर टकराते हुए... परछाई को लम्बी, तिरछी, आड़ी हो झाड़ियों , पगडण्डी,  सड़क, पानी, घास पर से गुजरते हुए....

विरासत में मिली पहिये  जैसी चाल, पिता के विचारशील कदम, वातावरण में गूंजती पढ़ी ना पढ़ी किताब के पन्नो की आवाज़ और मां का साया दस कदम पीछे होने का आभास इनको पहन कर ना जाने कितनी बार हुआ.. सबसे पहले मौसम की पहली बर्फ छूने का सुख हर वर्ष दशकों से इन्होने अपने ज़हन में समेटा है... वसंत के डेफोडिल , पतझड़ के चार सौ चोरास्सी रंग,  मानसून से  निखरे जंगल       के बीच भीगी- लजाती  ज़मी  से महकते  कुदरत के करिश्मो का  अलग - अलग स्वाद सार्ष्टि के साथ मिल बाँट कर चखा है... ख़ुशी में वो गौरिया के घोंसलों में झांकते, राह में ठहरे हुए बारिश के पानी से चुहल करते , फ़िल्मी स्टाइल में देवदार के तने पर हाथ टिका गोल-गोल घूम सुबह रेडियो पर सुना प्रेम गीत गुनगुनाते, फीते कसने को खाली बेंच पर बैठ कर थोड़ा सुस्ताते, गोल्फ कोर्स से लापता सड़क पर पड़ी लावारिस सफ़ेद गेंद को बादलों में छेद करने को हवा में पूरे जोश से उछाल देते ... दुःख में उसके दिल को टोहते, भरोसा दिलाते मुझे पहनो और बाहर झांको  देखो! जिंदगी कितनी   खूबसूरत  है  कभी आगे बढ़कर आंसू पोंछने की कोशिश नहीं की... ना ही कारण जानने के लिए प्रश्नों की बौछार की ... जब कोई बूंद गर्दन से लुढ़क कर उन पर ठहर जाती, वो तुरंत सोख लेते और अगले दिन बारिश को बुला कर उसके गोल निशाँ धुलवा देते ... नर्म, गुदगुदे, मखमली ... वो उसके  पैरों  के लिए इटली से बन कर आये थे... उनको बनाने वाला शायद उसे जानता था जिसने क़दमों को अपनी हथेलियों  में भींच कर कहा था... एक दिन इनके लिए अपने हाथों से जुते सीयूंगा .... ये जुते उसकी हथेलियाँ थी जो पाँव के आकार में ढल गई .... उनको पहनते ही उसके साथ का सफ़र तय था... और बादलों से निकल सूरज सामने खड़ा मुस्कुरा रहा होता...

समय के साथ वो अब उसके जैसे हो चले हैं त्वचा से ढीले - ढाले, चहरे से बदरंग, शरीर से कमज़ोर, एडी से घीस गए हैं जोड़ों से उधड़ने लगे हैं वो आराम चाहते हैं थक गए हैं जिंदगी से, थके भी क्यों ना ... पिछले गयारह साल में वो इतना सफ़र तय कर  चुके हैं जितना हवाई जहाज़ दो दिन में करता   होगा...   उनके साथ किया रोज पांच-सात  कोस का सफ़र इंच दर इंच ज़मीन पर हज़ारों बार दर्ज है सिर्फ मिट्टी के कणों को मालुम हैं उन्होंने कितनी बार तलवों को चूमा है...

उनकी जगह मजबूत, नीली सफ़ेद धारियों वाले, खुरदरी सोल के जुते खरीदे जा चुके हैं पर वो एडी के ऊपर की त्वचा से नरमी से पेश नहीं आते... वहां एक गुलाबी पिलपिला, पारदर्शी बुलबुला उभर आया है... मेड इन चाइना जो ठहरे.. भारतीयों से वही पुराना ऐतिहासिक बैर... पुराने जूतों के लिए घर में जगह नहीं...उनके शरीर की मुनियाद ख़त्म हो चुकी है ... इनसे छुटकारा पा लो, अब तो नए आ गए हैं... जुते वाली अलमारी कह रही है... घर कह रहा है... घरवाले कह रहे हैं सही तो कह रहे हैं...अब यह किस काम के.... चेरेटी बेग में डाल देना चाहिए ... इतने जीर्ण -जीर्ण जुते कौन पहनेगा?... उसकी हथेलियों में किसी और के पाँव?...नहीं बिन में ठीक है ... रीसाइकल बिन में? या कबाड़ वाले में? सफ़ेद प्लास्टिक के बेग में लिपटे वो अपनी अंतिम यात्रा की प्रतीक्षा में दो सप्ताह से लेंडिंग के कोने में पड़े हैं आज शाम देखा  तो वह कोना वीरान है ...

उसे पूरी रात जंगल में आग के सपने आये और नसों में बिच्छु रेंगते महसूस हुए ... ठीक उन्ही रातों की तरह जब उसने कहा था प्यार एक चमत्कार की तरह फिर घटित हुआ है उसके जीवन में और वह उससे दूर होना चाहता है ... पर कहाँ हो पाई प्यार से दूर ... वो यादों से निकल दरारों में यहाँ - वहाँ पीपल की तरह उग आता है यह जूते भी बिलकुल उसके जैसे हैं एक्सपाइरी डेट के बाद भी दूर नहीं होना चाहते ...

बाहर गहरा कोहरा हैं, बगीचे के हर कोने, घास के हर तिनके, घर की छतों और गाड़ी की देह को आज की सुबह, जमे पानी की स्लेटी चादर में लपेटे है वह शाल लपेटे ठिठुरते हाथों का काँटा कमर से ऊँचे हरे रंग के रिसाइकल बिन में फेंकती है अखबार और जंक मेल के बीच से सफ़ेद बेग में लिपटे सफ़र के साथी को उँगलियाँ में फंसा कर भीतर ले आती है और उन्हे जगह देती हैं यादों से सजी अलमारी में ... खुशियों वाली ऊपर की शेल्फ को छोड़,   नीचे वाली शेल्फ पर सबसे खामोश और नम जगह के बीच, दर्द की बगल में ....

Wednesday, 23 February 2011

उसकी बाहों में जन्नत नसीब होती...

दोबारा गर्म किए हुए चिकन, चावल, मटर पनीर, अचार, ब्रेड, कस्टर्ड, काफी, चाय ,  बीयर, वाइन,  रम की मिली जुली  मितली  लाने वाली  गंध वातावरण में झूल रही है.. कोई उनसे पानी ना मांग ले, वो ट्रे समेट,   बत्ती बुझा, ब्लेंकेट  इधर- उधर फेंक, उजाले की तश्तरियों  पर फटाक -फटाक ढक्कन   गिरा, पिछले हिस्से में परदे खींच आराम कर रही हैं..  खामोशी ने बंद खिड़कियों को देख सेंध लगा ली..  लोग सो  रहे हैं,  सोने की कोशिश में ऊँघ रहे हैं या कुर्सी से खीचा -तानी करते  स्क्रीन पर आँखे चिपकाए  बैठे है,  उसे महसूस हुआ  जो भी थोड़ा बहुत खाया वो यूँ ही पेट में तैर रहा है उसे वाइन नहीं लेनी चाहिए थी... उसके डाइजेस्टिव सिस्टम और अल्कोहल की नहीं बनती ... शायद  सोने में मदद करे.. "यस प्लीज़ ..."  ट्राली पर रखी बोतल और उसके बीच खुदबखुद कूद पड़ा... सभी सोने- जागने वाले लोग सांस लेने के लिए कम्पीट कर रहे हैं आक्सीजन के बाद  कार्बनडाईकसाइड के लिए...वो भी  उसके हिस्से में बहूत कम आई  है  दम घुट रहा है.... नज़रों ने  गर्दन घुमा कर पास वाले को भांपा  उसे  निढाल देख धीरे से दो अंगुलियाँ  फ्लेप के नीचे लगाई और  ऊपर सरका दी  ... पों फटे की सिंदूरी रौशनी में उसका चेहरा नहा गया... होंठ खुले के खुले  ....   फटी आँखें  बस देखती रह गई... हज़ारों बार पहले भी मिला  है.... नए - नए भेस में, नए से नए रंग - रूप में, नयी -नयी जगह पर, छिपते, उगते, भागते, रूकते, पीछा करते,  ढीठ बन कर  छत पर  खड़े रहते, विंड स्क्रीन पर आँख मारते ... यह चाँद है या उसका महबूब?   दुनिया भर के  सूफियों,  कवियों, लेखकों, प्रेमियों ने इसके बारे में सदियों से कई आसमान भर लिखा है पर वो उनको  सपनो में ही करीब से मिला है...  बचपन में चन्दा मामा और फिर महबूब की तरह  हमेशा  दिल में  रहा है आज दूरियां और चांदनी बिना उसकी राह रोक खड़ा है... आँखे उसे अमृत की तरह पीती हैं...  अंगुलियाँ गुलाब की पंखुड़ी की तरह छूती हैं... धड़कने उसे पहले चुम्बन के अहसास की तरह दर्ज करती हैं आत्मा इस आलोकिक सुख को अपने भीतर उसके लिखे खतों की तरह सहेजती है .. वह दोनों बांह उठाये अपने पास बुला रहा  है...जैसे ही उसने खिड़की से निकल पंख पर पाँव  रखा...चाँद ने उसे बाहों में भर ऊपर उठा लिया..  वो अपना आँचल भर रही है तारों से, वो उसे  आकाश के कोने - कोने में ले गया... उसने सारा आकाश खाली कर दिया... चाँद एक हाथ में उसे थाम और दुसरे हाथ से  उसके आँचल से एक- एक तारा उठा वो उन्हें वापस आकाश में टांक रहा है और सारा आकाश जगमगा रहा है  जिधर  देखो  उसका नाम लिखा है... इस पल  को जीने के लिए कई जीवन कम थे...   

परिचारिका हाथ में पानी भरा ग्लास लिए उसके कंधे हिला रही है वो चाँद की बाहों से छूट, धम्म  से ज़मीन पर आ गिरी है ... हाथों ने टटोल कर जल्दी में नीचे से पर्स उठाया, जेब में हाथ डाला, पहली, दूसरी, तीसरी  कंघा, शीशा, लिपस्टिक, एक, दो, तीन पेन, चश्मा, क्रेडिट कार्ड, सौंफ की पुडिया, इलायची,  रसीदें, हेयर बैंड, सेफ्टी पिन, बिंदी का पेकेट,  पोलो ट्यूब,  पाकिट डायरी, टाफी, मास्चराजिंग क्रीम,  डीओडरएंट, सेब, टूथ पिक, टिशु..  कहाँ गया?कहाँ गया? यहीं तो डाला था...   हाथों की उलट- पलट से और पैरों की उठक- पटक से,  चिंकी आखों, चपटी नाक और साल्ट- पेपर  बाल वाला पड़ोसी  कसमसाया, उसकी अधखुली आँखे माथे में सिलवट डाल, इसकी याचना भरी  आँखों को नज़रंदाज़ करते हुए, निगल  जाने के अंदाज़ में घूरती हैं...वो सीधा बैठ कर अपनी टाँगे सिकोड़ता  है,  सेंडल छोड़  उसकी टांगों से बचती वह खिसकती है उचक कर  छत से लटकता  बहुत बड़ा मुह खोलती है, एक भरकम चीज़  को नीचे उतार कर  फिर से शुरू होती है तलाश...  हथेलियाँ जगह  बनाती हैं  ठुसे हुए कपड़ों, पेकीटों, अचार की शीशी,  मिठाई  का डिब्बा,  किताबों   के पन्नो ,  फोन चार्जर, ब्रुश, शेम्पू.... खटर  -पटर, खसर -पसर ...  बैचैनी बढ़ती जा रही है वो सूरज की रौशनी के आँचल में ना छिप जाए ...पड़ोसी की अधखुली आँखे  खुलते -खुलते बड़ी होती जा रही है...  अंगुलियाँ जिप खींचती है  उसे वापस  टिका  ...फटाक! से बड़ा खुला  हुआ मुह बंद कर ... वापस  धम्म से सीट पर... आँखों में पानी और चेहरे पर मुर्दानगी... हाथ झुकते हैं टिशु तलाशने को ..अरे   यह क्या है? ..मिल गया ! ... हथेलियाँ  छूते ही मजबूती से पकड़ लेती हैं उसकी सफुर्ती और मुस्कराहट देखते ही पड़ोसी को टेटनस का दौरा पड़ गया  है ..तेज़ी से कांपते हाथ- पाँव, चटखती  हड्डियाँ,  बदहवास और घबराया हुआ वह अपनी जगह से खड़ा हो गया ... इससे पहले की वो  बम!.. बम! ...चिल्लाए... वो हथेली उठा और उसके सामने खोलकर समर्पण कर देती है ...  उसके चेहरे का रंग बदलता है लेकिन तेवर  नहीं ... "यू आर नोट अलाउड  टू  स्विच आन इन फ्लाईट"...वो अंगुली से इशारा करती है खिड़की से बाहर अपने टारगेट का... वो जितनी बार क्लिक करती है उतनी बार खुद को कोसती है काश उसके पास बम होता आज उसकी बाहों में जन्नत  नसीब होती ...  पड़ोसी उससे अधिक से अधिक दूरी रखते हुए  पास से गुजरती परिचारिका से धीरे से बुदबुदाता है "इन्डियन वीमेन आर मैड... इज देयर अ एम्प्टी  सीट? "                                        

Thursday, 23 December 2010

खामोशियों का सफ़र...

खामोशियाँ हमेशा से थी बाहर - भीतर, आस-पास  और भीड़ में कहीं ज्यादा.. अपने पिछले जन्म में किसी और रूप में....वो खफा-खफा, मायूस, विरक्त, क्षुब्ध, उपेक्षित ... आपेक्षाओं और सहिष्णुता  के जाल में फंसी...  खामोशियाँ काले कपड़े पहन, अंगूठा दिखाते हुए डर, द्वंद और निराशाओं के बादल लिए आसपास मंडराती थी...वो कुहासे की तरह घुप्प और सर्द .. उन्हे शीशे पर जमते हुए देखा जा सकता था... अंगुली से छुआ जा सकता था .... वो हर पल कंकर की तरह चुभती, यादों में, यतार्थ में, सोच में, सपनों में, पैरों में, नाड़ियों में, आँखों में.... नाड़ियों का खून जम जाता  और आँखे लाल रहती.. वो धड्कनों पर फाइव लीवर के ताले और अपने इर्द-गिर्द दीवारें ऊँची करने में मसरूफ थी... सुरज के उजालों में बाँधे रहती आंखों पर पट्टि और जीवन के अंधेरों को भरने के लिए बटोरती रहती इंतज़ार,  मायूसी, दर्द,  दिल के टुकड़ों के लिए जंग का खुरदरा रंग...रोबाट बने हाथ-पावों को सहलाती  और उन्हे  बहलाने के लिए पकड़ा देती हाथों में शापिंग की ट्रोली और पाँव के नीचे क्लच....खामोशियाँ एक सी सी टी वी के तरह पीछा करती... उसे गुनाह करते पकड़ने के लिए... कटघरे में खड़ा करने के लिए... गांधारी बनाए रखने के लिए .. आंखों से निकाल  खामोशी के कंकड़ को जब भी उछाल कर पानी में फेंका... ना तो पानी उछला और ना ही उसनें हलचल हुई ... हाँ आसमान से जरूर कुछ बरसा आँखों के साथ- साथ...

जिस पल आत्मा पर खामोशियों का बोझ शरीर के वज़न से अधिक हो गया और दोनों का एक दुसरे को झेलना दूभर हो गया...खामोशियों ने एक दिन खुली हवा में सांस लेने का साहस बटोरा और बस फिर क्या...  सिर्फ  एक हवा के झोंके से  ... खटाक.!..खटाक.!..भीतर के सभी बंद दरवाज़े और खिड़की हवा में झूलने लगे...  खामोशियों  ने  अमावस्या के रोज़ चांदनी पी...   अब खामोशियों को समय की धारा में डूबने से बचने के लिए तिनके की तलाश नहीं थी... उनकी निगाह आसमान पर थी... खामोशियाँ को कदमो की आहट सुनाई दी,पत्तियों के हिलने से उत्पन्न  संगीत से दिल पर कसे तार  ढीले  होने लगे...हरियाला जंगल आँखों में क्या इस तरह झांकता है? और चाँद खिड़की पर उतर आवाज़ देता है...  खुली हवा में खामोशियों के पंख खुदबखुद खुल जाते... वो घर लौटते परिंदों का पीछा करती तो कभी आसमान में हवाई जहाज़ के पीछे खींची लाइन को एक फूक से मिटा देती... आइना चेहरे से बतियाते हुए पहरन के भीतर झांकता, गोरय्या हर सुबह बिजली के तार पर चहकती, गिलहरी ठिठक कर खड़ी फिर फुदक कर झाड़ियों में गायब हो जाती, भाग्य खामोशियों के हक़ में खड़ा था और तभी  स्रष्टि ने आसमान के कान में कुछः कहा... वो ब्रुश लिए सपनों में इन्द्रधनुषी रंग घोलने लगा, वजूद खामोशियों की रूह बन इतराने लगा ... खामोशियाँ कभी सुनहरी धूप, कभी सोलह साल की अल्हड़ लड़की, कभी पतंग, कभी सीप, कभी ओस की बूंद, कभी नदी, कभी कविता, कभी पत्ती तो कभी फोटोसिन्थेसिस..... दो सिरों से बंधे आज और अभी के तार पर चलने के लिए हवा में संतुलित ... खामोशियों के लिखे बैरंग ख़त सरहदों को पार कर उनके पते ढूँढने लगे जिनसे मिलना खामोशियों के भाग्य में दशकों से दर्ज था.. खामोशियाँ को जादू आता था वो जब चाहे जेठ की  धूप,  घर के पिछवाड़े  अमरुद का बाग़, दादी का खजाने भरा संदूक, कालेज के गेट पर खड़ा उसका इंतज़ार, बंद रेलवे फाटक पर बिकती नारियल की गिरी... जो भी चाहो वो बन जाती ...

 खामोशियाँ तलाशने लगी थी एक खामोश कोना जहाँ रोज मरने से पहले कुछः देर जिया जा सके..... वो बस स्टाप के शेड और आसमान छूती इमारत की छत के नीचे, रसोई और बेडरूम की नजदीकियों  के बीच, अलार्म और बत्ती बुझाने  के बीच, बिल और रिपोर्ट की डेडलाइन के बीच, जिम्मेदारियों और कर्तव्यों के बीच, प्यार और नफरत के बीच, किसी को भूलने और माफ़ करने के बीच सांस लेने लगी थी.. उन्होंने पेड़ों, परिंदों, पर्दों, प्रथ्वी और प्रक्रति को अपना राजदार बना लिया था ... खामोशियों के अपने सुख, दुःख थे... उनकी अपनी एक दुनिया थी नियति थी... जो खामोशियों ने ओस के धागे से पत्तियों पर लिखी थी, खामोशियाँ  खामोशियों में जीती थी, एक दुसरे को सुबह-शाम पीती थी, उन्ही में सोती थी, उन्ही में जागती थी, खामोशियों दिन में सपने देखती और नींद में उन्हे सच कर देती.... .वो अचम्भित थी ... खामोशियाँ टूट कर पहले से अधिक साबुत और सार्थक  हो गई ... उन्हे बड़ी राहत थी.... मंजिल का पता उनकी बंद मुठ्ठी में था और उनका सफ़र जारी था...


 फोटो- राउंडी पार्क लीड्ज़      

Thursday, 11 November 2010

"मिस माई लिटल ब्रदर इज जस्ट लाइक यू"..

दुसरे ही दिन से उसे लगने लगा था..वो मासूम आँखे कुछः टटोलती हैं,खोजती हैं कुछः कहना चाहती हैं ...अक्सर उसने देखा सत्ताईस झुके सर पेन्सिल की नोक घुमा रहे होते... और रेचल पेन्सिल का टॉप मुह में घुमाते हुए उसकी तरफ देख रही होती...और उससे नज़रें मिलते ही सर झुका पेन्सिल को कापी पर घुमाने लगती...कुछः मिनटों बाद फिर उसकी पेन्सिल मुह में और आँखे उस पर चिपकी हुई....रेचल के रूखे, उलझे, सुनहरे, खुले बाल, नयी पत्ती के रंग की कच्ची नींद में जागी आँखे, कपास जैसे गाल पर नाख़ून से खिंची बैंजनी लकीर बिना बोले बहुत कुछः कह जाते और फ्राक पर स्पेगेटी, चाकलेट, दूध, कस्टर्ड, केचप के निशाँ उसके सुबह के ब्रेकफास्ट का या रात के डिनर का मेनू बता रहे होते...

यह स्कूल चार-पांच हज़ार की आबादी वाले एक छोटे से गाँव में था,यह गावं माइग्रेशन -इम्मीग्रेशन से अछूता था...तभी तो सड़क पर छोटे बच्चे और बूढ़े उसे पीछे मुड़-मुड़ कर देखते...बच्चे अंगुली उठा अपने मां -बाप से प्रश्न पूछते " व्हाट इज देट रेड स्पोट आन हर फॉर हेड... इज ईट ब्लड? उसके कुछः बोलने से पहले ही उनके माँ -बाप उससे माफ़ी मांगते हुए उन्हे एलियन के सामने से खींच कर ले जाते....उसका मन होता पर्स में से पत्ता निकाल लाल खून की बूंद बच्चों के माथे पर चिपका दे... वह अक्सर सोचती उन छोटी - छोटी उँगलियों की जिज्ञासा, बड़े - बड़े हाथों ने क्या कह कर मिटाई होगी ...

बी एड की ट्रेनिंग के अंतर्गत उसे ऐसे ही स्कूल में कक्षा एक की क्लास मिली थी... वह खुश थी... पहली क्लास के बच्चों में उसके अंगेजी के उच्चारण पर मुस्कुराने और हँसी उड़ाने का हौसला तो कम होगा... और यदि उड़ाया भी तो उनकी उम्र के अनुरूप झेंप और तकलीफ भी कम होगी ... पर यहाँ मुस्कुराने की बारी उसकी थी उनका योर्कशायर का डायलेक्ट बस को बूस,वाटर को वोतर, कलर को कोलर .. यकाएक स्थानीय अंग्रेजी सिखाने को उसके अट्ठाईस शिक्षक....

गावं के स्कूल से पहले वो ऐसे स्कूल में थी जहाँ अशवेत बच्चों के मुकाबले शवेत बच्चे अल्पसंख्यक थे, जब पहले दिन रजिस्ट्रेशन के समय उसने एक भारतीय बच्चे को अंकुर कह कर बुलाया तो अंकुर सहित सभी हँस पड़े... और एक साथ बोले " हिज़ नेम इज एंकर...मिस!" अंकुर को एंकर बनाना बहुत आसान था किन्तु एंकर को अंकुर बनाने के लिए शिक्षक का शवेत होना ज़रूरी था...इसलिए तमाम कोशिशों के बावज़ूद वह एंकर बन कर ही अंकुरित होता रहा ... हरी का हैरी, अजय एजे और विजय वीजे बन कर... भारतीय मूल के बच्चों का नामकरण शवेत शिक्षकों द्वारा होने के बाद माता- पिता उनका नया नाम गर्व से पुकारते थे... पेरंट्स इवनिंग में उसके मुह से निकले सही नाम के उच्चारण को स्कूल द्वारा दिए गए नए नाम से सुधारने की कोशिश करते ... तब ट्रेनिंग के दौरान प्रोफ़ेसर वर्मा की कही बात दिमाग में घूम जाती "हम आज़ाद हो गए हैं लेकिन हम भारतीयों के दिल आज़ाद नहीं हुए वो अभी भी कोलोनाज्ड हैं "... एक बार उसी स्कूल में प्रोफ़ेसर वर्मा उसकी क्लास का निरिक्षण करने आई थी... स्कूल ख़त्म होने से पहले प्रिंसपल प्रोफ़ेसर वर्मा को हेलो करने आया और बात करते हुए उसका ध्यान प्लास्टिक के लेगो पीस जोड़ -जोड़ कर बने हेलीकाप्टर पर गया उसकी टूटी पंखुड़ी कीतरफ इशारा करते हुए बोला "पता नहीं क्यों भारतीयमूल के बच्चे खिलौने बहुत तोड़ते हैं"... मिसेज वर्मा ने हँस कर जवाब दिया "मिस्टर लीच भारतीय बच्चों को खिलोनो की रीसेलेबल वेल्यू नहीं मालुम, उनके माता -पिता खिलोनों की पेकिंग संभाल कर नहीं रखते... उन्हे तोड़ने और संभाल कर रखने का निर्णय उनका खुद का होता है..." आफिस के बाहर कोई इंतज़ार कर रहा है यह कह कर मिस्टर लीच ने विदा ली...उस दिन के बाद से उसके द्वारा किये गए किताबों, खिलोनों और एजुकेशनल एड्स के आर्डर पर मिस्टर लीच ने अन्य शिक्षकों की तरह उससे भी प्रश्न करना बंद कर दिया...

अशवेत बच्चों के बहुमत वाले स्कूल में पेरंट्स इवनिंग का होना ना होना बराबर था...आधे से अधिक तो अभिभावक आते ही नहीं, जो आते उनके लिए शिक्षक ने जो बच्चे के बारे में कहा उससे अधिक जो नहीं कहा उसे समझने की ज्यादा आवशयकता थी, पेरेंट्स इविनिंग में आना रंग -बिरंगे हिजाबों के लिए अनावश्यक ना भी हो लेकिन जो घर में उनसे छोटे हैं वे आने से रोकते हैं ...वैसे भी क्या फर्क पड़ता है यहाँ प्राइमरी स्कूल में कोई फेल नहीं होता... गर्मियों की छुट्टी छ सप्ताह की जगह पाकिस्तान जाकर छ महीने बढ़ा लेने पर भी बच्चे अगली क्लास में चले जाते हैं... आज उसे प्राइमरी स्कूल में फेल ना होने वाले सिस्टम के फेलियर यूवाओं को देख कर सिर्फ तकलीफ होती है हेरानी नहीं...ओर ना ही मलाल होता है जिस सिस्टम को बदलने की ताकत उसमें नहीं थी उसका पुर्जा नहीं बनी ... ऐसे स्कूलों की छत के नीचे पढ़ाने ओर मन बहलाने के साधनों का ढेर लगा था किन्तु  इसके ऊपर स्लेटी  आसमा के टुकड़े में अपेक्षा, उम्मीदों ओर संभावनाओं का बड़ा अकाल था.. असाधारण बचपन से साधारण उम्मीदें...  मासूम कन्धों पर उगने वाले अनगिनत पंखों की जोड़ी को स्टोर रूम में धूल खाते देख ... उसे अपना वो स्कूल याद आया जिसकी कच्ची दीवारों के भीतर सूरज, चाँद, ओर इंद्र धनुष पलक झपकते एक उड़ान में हासिल थे ...

जब प्रिंसपल के कहने पर उसने माइकल की सालाना रिपोर्ट बदलने से इनकार किया तो उसी समय उसे मालुम हो गया था, कांट्रेक्ट की उम्र अब इसी टर्म तक है प्रिंसपल ने कहा माइकल की माँ ने तीन स्कूल बदलने के बाद बड़ी उम्मीद से हमारे स्कूल में उसे दाखिल करवाया है वो हमारी स्कूल गवर्नर है... बड़ी निराश होगी... माइकल की रिपोर्ट बनाते समय वह खुद से कहीं अधिक निराश थी, माइकल को उसने एक चुनौती की तरह अपनाया था, उपलब्धि और प्रतिस्पर्धा का स्वाद चखाने के लिए उसके हर छोटे कदम को सीढ़ी के ऊपर खड़े होना दिखाया और क्लास से बाहर उदंडता से बचाए रखने के लिए, वह उसका हाथ ऐसे थामे रहती जैसे खो जाने के डर से भीड़ में मां अपने बच्चे का हाथ थामे रहती है... माइकल के आलसीपन को रिवार्ड करने का अर्थ उसके भविष्य से खिलवाड़ करना, जिसके लिए वह खुद को राजी नहीं कर सकी... इसलिए स्कूल और माइकल दोनों को छोड़ना पड़ा...

यहाँ क्लास में बच्चों के बीच वह उन्ही की तरह रंगहीन हो जाती है उन सफ़ेद चेहरों की मासूम आँखों को अभी तक यही मालुम है रंग सिर्फ रेनबो, फूलों और कपड़ों का होता है जिस दिन वो इंसानियत को काले सफ़ेद रंगों का लिबास पहना देंगे ..उस दिन वो बच्चे नहीं रहेंगे ... स्टाफरूम में उसकी चमड़ी का रंग हरी- नीली-स्लेटी आँखों को ब्लेक बोर्ड की तरह नज़र आता है जहाँ अँगुलियों ने नहीं होठों ने चाक पकड़ा हुआ है ...उनकी दी गई नसीहतें उसकी मान्यताओं और मूल्यों से टक्कर खा कुछः देर के लिए कुर्सी के नीचे लुढ़क जाती और उनके मज़ाक और गासिप उसके सर से गुजर जाते ... कभी बालों से नीचे उतरे तो वह उसे भद्दे और बेस्वाद लगे ...वो उनकी बात पर ना हँसने पर उसे समझाने के लिए उंचा बोलते ... उसे ना हँसने का अधिकार है... कुछः बोलने को होती तो...स्टाफ रूम  में आते ही जीभ तालू से क्यों चिपक जाती है ?...सोशली एक्सेप्ट होने लिए हँसी का मुखोटा पहना सीख लिया...  

उसकी प्लेग्राउंड में ड्यूटी है आज टर्म का आखरी दिन है रेचल और उसका भी स्कूल में आज आखरी दिन है ... रेचल के माता-पिता ने घर बदला है उसे तीसरी क्लास में पास के स्कूल में भेज रहे हैं...और उसने करियर बदलने का निर्णय ले लिया है...प्ले ग्राउंड में धमा-चोकड़ी मची है बच्चे एक दुसरे के आगे - पीछे भाग रहे हैं... रेलिंग पर लटक रहे हैं... फ़ुटबाल उछाल रहे हैं झपट रहे हैं ... फूटबाल पास करने के लिए चिल्ला रहे हैं एक दुसरे को धक्के दे रहे हैं.. कुछः बार - बार उसके पास आकर एक-दुसरे की शिकायत लगा रहे हैं लड़कियों के समूह स्टापू खेल रहे हैं ओर जब भी फ़ुटबाल उनके करीब आती है वो उसे मैदान के बाहर फेंक देती हैं उसका ध्यान रेचल पर है जो उसे दूर खड़ी एकटक देख रही है....उसके उलझे सुनहरे बाल बाल हवा में उड़ रहे हैं जिन्हें वो अँगुलियों से पकड़,गर्दन पीछे झुका, बार-बार कानों के पीछे उमेठ्ती है... उसकी फ्राक पर चिपका डिनर और ब्रेकफास्ट का मेनू नीले मटमैले कोट से ढका है जिसके दो बटन टूटे हैं... वह लेलिपोप जिसे उसने घंटी बजने से पहले क्लास के बच्चों में बांटा था...मुह में डालती है और निकालती है उसके गालों का रंग लेलिपाप के रंग से मेल खा रहा है ... वह लेलिपाप की डंडी को मुह में दबाये दोनों हाथ हिलाती है बीच की दूरी को नापती हुई वह प्ले ग्राउंड के दुसरे कोने से बेतहाशा उसकी ओर भाग रही है... पास आकर हाँफते हुए मिस के कोट से बाहर लटके बर्फीले हाथ को चिपकी अंगुली से छूते हुए रेचल के गुलाबी होंठ एक प्रार्थना सी बुदबुदाते हैं "मिस माईलिटलब्रदर इज जस्टलाइक यू".. मिस रेचल के दोनों हाथ अपने हाथों में ले, घुटने मोड़, झुक कर मुस्कुराते हुए रेचल की आँखों में उसके भाई के काले बाल और कत्थई आँखें खोजती है लेकिन वहां उसे नज़र आती है स्वीक्रति की हज़ारों लौ जिनको उसने बरसों से हर सफ़ेद चेहरे पर चमकती आखों में ढूढ़ा है ...

फोटो गूगल सर्च इंजन से

Friday, 30 July 2010

आज थेंक यू कहने के लिए नीली आँखों वाली पास नहीं है...


बशीरा ने नज़रें उठाई और बस स्टाप के अन्दर लगे स्क्रीन पर झांका, जो पिछले पंद्रह मिनट से बता रहा है कि छत्तीस नंबर बस तीन मिनट में आ रही है, पुश चेयर में बंधे साजिद और जावेद, पलट -पलट कर उसकी और देख, हाथ उठा बेल्ट से मुक्त होने को मचल रहे हैं, पुश चेयर के नीचे टोकरी में दो बड़े प्लास्टिक के शापिंग बैग हैं एक में चार छोटी- छोटी टी शर्ट हैं, दो कार्डराय की पैंट हैं दुसरे थैले में उनके नए जूते और तीन - तीन जोड़ी नयी जुराबें... उसके कंधे पर पर्स नुमा बड़ा बेग... जिसमें पड़ी पानी, दूध की बोतल अपना भार कंधे को प्रत्येक क्षण तुलवा रही थी..हाई स्ट्रीट में उसके पास से गुजरते लोगों की आँखों में छिपा परायापन जो आँखें मिलते ही आँखों से बाहर आ जाता है यहाँ बस स्टाप पर उसके पास लाइन में आकर खड़ा हो गया है जिसने बस का इंतज़ार और लंबा कर दिया ... उसे लगता है उसका सारा वजूद और पहचान उसके सर पर बंधे एक मीटर कपड़े में है वो समझ सकती है चार दिवारी के बाहर सूरज और हवा को एतराज़ है वह उसके बालोंऔर बालों में लगी क्लिप को कभी छू नहीं पाए.. किन्तु आस पास खड़ी परछाइयाँ क्यों चश्मा बदल -बदल कर देखते है एक चश्मा कहता है बेचारी को रोज़ पीटता है, दुसरा दो बच्चे पुश चेयर में हैं चार स्कूल में होंगे, तीसरा बस में इसके पास वाली सीट ना मिले लहुसन की बदबू बर्दाश्त नहीं होती, चौथा सरकारी खजाने पर परिवार ऐश करता है, पति बेरोजगार है या टेक्सी चलाता है और टेक्स चुराता है,पांचवा इन्हें सरकार वापस क्यों नहीं भेज देती, छटा लिबास के भीतर छाती का भार और आकार नाप चुका है...

बड़ा सोच समझ कर घर से निकली थी... आसमान साफ़ है हवा में सब्र है हाई स्ट्रीट में सेल लगी है... दो घंटे में, दो बच्चों के साथ, दो बड़ी दुकानों में जाकर ही उसके हाथ- पाँव, कंधे और सब्र सभी ने जवाब दे दिया था .... घर से खिला - पिला कर लाइ थी... आते हुए बस में सो गए थे और सोते रहे.. लौटने के समय जागे है... बस स्टाप के भीतर, बिल बोर्ड पर बदलते पोस्टर्स को दोनों बड़े ध्यान से देख रहे हैं .. बस स्टाप अब बारह - पंद्रह लोग है सभी बूढ़े लाइन में हैं और जवान लाइन से बाहर ... यदि बस स्क्रीन पर बताये समय पर आ गई होती तो अब तक वह घर में होती... तभी उसने देखा एक नीली आखों वाली डबल पुश चेयर को धकेलती हुई लाइन में पीछे आकर खड़ी हो गई, उसकी घुटनों तक लम्बी काली स्किर्ट पर उसकी नज़र गई,जो उसकी स्किर्ट से थोड़ी ही ऊँची है यह राज़ सिर्फ बशीरा को मालुम है.. दोनों की निगाह एक दुसरे की पुश चेयर पर है जिसका मेक एक है, डिजाइन और साइज़ एक है, बच्चों का जुडवा और उनकी उम्र बराबर होना एक है और पब्लिक ट्रांसपोर्ट में सफ़र करने का संघर्ष एक है इन सभी समानता को आखों ही आखों में दर्ज करती चार आँखे मुस्कुराई ...

तभी छत्तीस नम्बर बस आ गई.. तीन लोग जो लाइन में आगे थे उनके चढ़ने के बाद बशीरा ने पुश चेयर आगे धकेली..
"तुम वहीं रुको यह पुश चेयर बड़ी है अन्दर नहीं आ सकती.." ड्राइवर ने सीट बैठे हुए हाथ बढ़ा कर रोकते हुए कहा..
"लेकिन यह तो आ रही है..." बशीरा पुश चेयर के अगले पहीये उठा बस के पायदान पर लगाने को थी...
"नहीं यह इस तरह नहीं आ सकती ..." ड्राइवर सीट से उठ कर बस के दरवाज़े पर आकर खड़ा हो गया...
बशीरा अपने से पीछे अन्य यात्री को रास्ता देती हुई बस के दरवाज़े की बगल में सरक गई ... साजिद और जावेद को बेल्ट से मुक्त किया .. उन्हे फूटपाथ पर खड़ा कर ...पुश चेयर के दोनों हत्थों को क्लिक करके बंद किया..
सबसे बाद में नीली आँखों वाली जुड़वां बच्चों को पुश चेयर में धकेलती आई और पुश चेयर के अगले पहिये उठा दोनों बच्चों सहित बस के अन्दर चली गई... वह पुश चेयर को बच्चों सहित अन्दर छोड़ बाहर निकली...उसने जावेद को गोद में लिया... साजिद बशीरा की गोदी में था... बशीरा ने हत्थों से और नीली आखों ने पहियों की तरफ से उठा कर पुश चेयर को बस में लाकर खोला और सलीम और जावेद को उसमें बैठा दिया ...दोनों के माथे पर पसीना चमक रहा था ... ड्राइवर टिकट देने के लिए बशीरा का इंतज़ार कर रहा था...

बशीरा ने नीली आँखों वाली को ना जाने कितनी बार थेंक यू कहा...वो दोनों पुश चेयर खड़ी करने वाली जगह के सामने खाली सीट पर बैठ गई....

"तुम कुछः करोंगी नहीं?" नीली आँखों वाली ने बशीरा से कहा..

"क्या मतलब?.." बशीरा ने आखें गोल करते हुए कहा...
"जाओ ड्राइवर का नाम पूछ कर आओ..." बशीरा को अब कुछः -कुछः समझ आने लगा ... वह अपनी सीट से उठी, हेंडल पकड़ झूलती हुई आगे बढ़ी... ड्राइवर ने नाम देने में आनाकानी की... और एक बहस के बाद अपना नाम दे दिया...

"तुम्हारे पास कागज़ और पेन है?" नीली आँखों वाली ने पूछा...
बशीरा ने बेग टटोला और पिछले महीने का हास्पिटल अपाइंटमेंट लेटर निकाला.. इतनी देर में नीली आखों वाली ने पिछली सीट से पेन का इंतजाम कर लिया.. .

"चलो लिखो तुम्हारे साथ क्या हुआ... " नीली आँखों वाली ने लेटर को उलट कर मुड़े -तुड़े पन्ने को अपने पर्स पर रख लिखने का सहारा दिया... बशीरा ने जल्दी - जल्दी आठ लाइने लिखी...
"जाओ बस में बैठे लोगों से .. इस कागज़ पर हस्ताक्षर लो.. मैं बच्चों पर नज़र रखती हूं .."
बशीरा एक-एक कर सभी के पास गई... किसी ने कहा मैंने कुछः नहीं देखा और किसी ने देख कर भी हस्ताक्षर देने से इनकार किया ... और कुछः को हस्ताक्षर देने के लिए आठ लाइने पढ़ने की ज़रुरत महसूस नहीं हुई...बशीरा अपनी सीट पर लौटी तो नीली आँखों वाली ने अपने हस्ताक्षर किये... आई फोन से उसने पता ढूंढ लिया था नीचे लिख दिया...
बशीरा का बस स्टाप आ गया और वह उस कागज़ को अपने बेग में समेट नीली आँखों वाली का थेंक यू करती रही.. पुश चेयर को धकेलती बस से उतर गई...

एक सप्ताह बाद बशीरा के नाम ख़त आया ... ट्रांसपोर्ट ऑथोरिटी ने उसकी शिकायत दर्ज कर ली है और तहकीकात शुरू हो गई है... इस तहकीकात के परिणाम के बारे में उसे छ सप्ताह बाद सूचित किया जाएगा...

बशीरा को परिणाम और तहकीकात से कुछः ज्यादा उम्मीदें नहीं थी ... लेकिन अपने भीतर के विश्वास और एकता की ताकत से मिलने के बाद आईने ने उसकी शक्ल बदल दी ... इस दुनिया में वह अकेली नहीं है उसका संघर्ष भी अकेला नहीं है ... नीली आँखों वाली का चेहरा अक्सर उसे आईने में नज़र आता ... वह सोचती उसने उसका नाम और फोन नंबर भी नहीं पूछा....

आठवें सप्ताह के मध्य में उसे पत्र मिला ... ट्रांसपोर्ट ऑथोरिटी उसके साथ हुए सलूक के लिए क्षमा चाहती है, ड्राइवर पर नस्ली भेदभाव और लिंग भेदभाव का गुनाह साफ़ साबित होता है ऐसा कर्मचारी ट्रांसपोर्ट ऑथोरिटी की नौकरी के लिए अनुपयुक्त है और ऐसे लोगों को समक्ष लाने के लिए ट्रांसपोर्ट ऑथोरिटी उसका धन्यवाद करती है...

आज थेंक यू कहने के लिए नीली आँखों वाली पास नहीं है... वह एक क्रान्ति और शक्ति की तरह हमेशा उसके भीतर रहेगी और सही वक्त पर, सही जगह पर, स्त्री के अधिकारों के लिए, अन्नाय के विरुद्ध उसकी आवाज़ बन कर...

फोटो गूगल सर्च इंजन से

Sunday, 20 June 2010

तुम कैसे पिता हो?

जन्म पर


दादी ने मुह छुपाया,


मौसम ने आँख दिखाई,


गर्भ से बरसों पूर्व


"गुप्त" की किताब से


पापा ने दे दिया


बिटिया को नाम






गुड़िया नहीं लाये,


माला नहीं लाये,


सफ़ेद, नेवी ब्लू सिलवटें मिटाने,


सिंड्रेला के जूते चमकाने,


कापी पर जिल्द चढ़ाने,


मच्छरों के यमराज बन,


पापा घर जल्दी आये,






थके कन्धों पर झूलता,


खाकी थले से झांकता,


किताबों के पन्नो पर,


लाया काबुलीवाला


एक नया आकाश सुनहला,






नहीं समझाए घोंसले के कायदे क़ानून,


नहीं दिखाए गलतियों को तेवर,


नहीं खींची रीती-रिवाजों की लक्ष्मण रेखा,


नहीं बने जवान पाँव के दरबान,


नहीं पूछा "वो कौन" सड़क पर मिला था,


नहीं डराया यौवन को अँधेरे और अकेले से,


नहीं चुनी सपनों के लिए पगडण्डी और उड़ान,


नहीं लगाई पंखों पर डाक्टर, इंजिनियर, आई ऐ एस की मुहर,


पापा! तुम कैसे पिता हो?



विदा के समय


बिलख-बिलख रोता बालक,


निर्णायक पलों, फैसलों में मेरे


विश्वास की चादर ओढ़


एक मूक गवाह हो ...

Friday, 11 June 2010

यह कैसा स्पंदन है... यह कैसी अनुभूति है... यह कैसा भय है...

वो बचती फिरती थी सौरभ से... जैसे राहगीर बचते है रास्ते में आ जाने वाली बिल्ली से... दो कमरों के सरकारी क्वाटर में रोज आने वाले मेहमान से कितना बचा जा सकता है.. पिछले दो बरस से शाम को उसका घर आना उसी तरह निश्चित था, जैसे शाम को सूरज का छिपना, सुबह को सभी के नलों में ताज़ा पानी आना, दिन में फेरी वालों का आवाज़ लगाना, दोपहर में दो घंटे बिजली का चले जाना, रात को चौकीदार ने डंडे खडखडाना... शाम के छ बजते ही सीढ़ियों में धूल को रगड़ती उसकी चमड़े की चप्पल, वातावरण का स्वाद बदलती एक कर्कश ध्वनि ... जिसे दिव्या अपने कानों में कम दांतों के बीच अधिक महसूस करती , वह घर के किसी भी कोने में हो यह आवाज़ सौरभ के आने का ऐलान करती उसके कानो और मुह में किरकिराहट लेकर रोज़ पहुँच जाया करती... वह दरवाज़ा खोलने के बजाए... उससे बचने के लिए कहीं और पनाह लेने के लिए उठ जाती, फिर भी कितनी कोशिश करे आमना -सामना हो ही जाता... मां को भी आदत थी उसी को आवाज़ लगाती " दिव्या पानी तो लाना सौरभ का गला सूख गया होगा... "अब जरा चाय ले आ..." अँधेरी रसोई में उसे बत्ती जला कर जाने में भय खाता था...अँधेरे में बाहर पिकनिक करते मकोड़े और झींगुर को छिप जाने का अवसर प्रदान करने लिए वो अक्सर बत्ती जलाकर, आँखें मीच कुछ देर दरवाज़े पर खड़ी रहती ... पानी का ग्लास लेकर रसोई से ऐसे भागती, जैसे सभी झींगुर रसोई छोड़ उसके पीछे दौड़ेंगे ... उसका भयभीत चेहरा देख वह समझ जाता... " देखो यह डाक्टर बनेंगी ... कीड़े को देख बेहोश होने को हैं..." उसका यह कटाक्ष, उसके आत्मविश्वास को लहुलुहान करने को काफी था और सौरभ के होंठों की मुस्कराहट, उसके आँखों में अंगारों को दहकाने का इंधन बनती.... उन अंगारों पर पलकों की ठंडी चादर थी इसलिए उन अंगारों को कभी कोई देख नहीं पाया ... वह आँखे नीची किये सौरभ की ओर देखे बिना, पानी का ग्लास मेज पर टिका, उसी तेज़ी से कमरे से निकलती जितनी तेज़ी से वह रसोई से निकली थी... सौरभ की आवाज़ उसे पकड़ने पीछे भागती "अरे रुको तो मुझे एक ग्लास पानी और चाहिए.."

वो दीपा दीदी को घंटो पढ़ाते नहीं थकता.... दीपा दीदी बी एस सी कर रही थी और शायद उनका दिल सभी से छुप कर सौरभ से प्रेम, यह बात उन्होंने कभी नहीं बताई .... . दीदी का गोरा रंग, गोल चेहरा, मोटी-मोटी आँखे , तीर कमान सी भवें , पंखुड़ी जैसे होंठ ... सौरभ के आने से पहले आईने से गिफ्त्गु करते .... और आईने की तो आदत है उसके पेट में कोई बात नहीं पचती ...उसी ने चुगली की थी ... उसे पूरी तरह यकीन नहीं हुआ था और ना ही उसने दीदी से पूछने की हिम्मत की जबकि वह उससे सिर्फ दो साल ही बड़ी थी.. अक्सर वह सोचा करती काश उसका भी चेहरा दीदी जैसा होता, आईने को भी उससे प्यार होता...

सौरभ इलेक्ट्रानिक इन्जिनीरिंग के फाइनल इयर में था और जब देखो वह दीदी, माँ और पिताजी के सामने आई आई टी में होने का बिगुल बजाने लगता ... और दिव्या हर सत्रह वर्षीय छात्र की तरह, बारहवी क्लास में अच्छे नंबर के साथ, डाक्टरी में दाखला मिलने की लाटरी निकल जाने के सपने देख रही थी, उस सब में सबसे अधिक आड़े आती थी ... रोज़ - रोज़ आने वाले मेहमान की खिदमत ... दीपा दीदी को वह केमेस्ट्री पढ़ाता, वो भी मुफ्त क्योंकि उसकी मां और मां सहेली थी... बहुतसे काम साथ-साथ करती... जैसे स्वेटर बुनना, कचरी -पापड़ बनाना, सब्जी खरीदने जाना और मंदिर जाना.. जब उसका मन चाहता बिना उसे सतर्क किये लगे हाथों उसे भी अपने किताबी ज्ञान के पंजों से दबोच लेता ....ज़रा इंटर मोलिक्यूलर फोर्सीज़ के नाम गिनाना? .... उसकी जुबान वहीं फ्रीज़, खुलती तो कभी हकलाने तो कभी तुतलाने लगती .... जानते हुए भी घबराहट में जवाब हमेशा गलत निकलता .. जवाब सुनते ही उसको तोप का निशाना बनाया जाता .. "तुम्हारी जगह लड़का होता तो मैं उसे पंखे पर उलटा लटका देता..." दिव्या की आखों में चिंगारियों तैरती उन्हे बुझाने के लिए वह चुपचाप दुसरे कमरे में चारपाई पर औंधी लेट आंसू बहाती.... मां हमेशा उसकी तरफदारी करती "तेरा भला चाहता है तभी तो पूछता है..." किताब लेकर उसके पास बैठा कर...नंबर अच्छे आयेंगे... "मुझे फेल होना मजूर है उससे पढ़ना नहीं... " वह मन ही मन बुदबुदाती हुई कमरे से बाहर निकल छत पर पनाह लेती...और तब तक नीचे नहीं उतरती जब तक वो घर से ना चला गया हो... जिस दिन सौरभ का मन पढ़ाने का नहीं होता वह झक मारता माँ और पिताजी से... कभी राजनीति पर, तो कभी वेदों पर, कभी मार्क्स वादिता पर, कभी जातिवाद, कभी समाजवाद, कभी चेतन्य महा प्रभु , कभी हिंदी साहित्य ... इतवार का दिन खुशगवार गुज़रता उस दिन वह कभी घर नहीं आया..

"अरे! दिव्या तुम्हें बालों से दुश्मनी थी या अपनेआप से ... पर कटा कर बिलकुल मुंडी भेड़ दीखती हो"... कमरे में बैठे सभी हंस पड़े... वो दनदनाती हुई कमरे से निकली बिना बत्ती जलाए और बिना छ्पकलियों की परवाह किये भाग कर छत की सीढियां चढ़ गई ... एकादशी के चाँद, मई की गर्म हवा, जंग लगे कपड़े सुखाने वाले तार को पार कर ...पानी की टंकी की ओट में, सफेदी लगी मुंडेर पर, फुर्सत से रोने बैठ गई और आँखों से बहते पानी को अपने दुपट्टे से नहीं पैरों के नीचे प्यासी इंटों को सोखने दिया ... दीदी उसे मनाने आई थी यह कह कर कि वो चला गया है नीचे उतरी तो वह दरवाज़े पर खड़ा, माता -पिता से विदा ले रहा था... और उसे देखते ही बोला "दे आई छत पर मच्छरों को दावत?... " दिव्या ने जल्दी से कोहनी को बेरहमी से खुजलाते अपने नाखुनो को अलग किया ..... "आंटी आपकी बेटी गूंगी है क्या?" फिर सब ज़ोरों से हंस दिए ... वो कमरे की तरफ मुड़ी और सौरभ की आवाज़ ने दिव्या का पीछा किया ... "अरे! बचो! .. सफ़ेद भूत से चिपट कर आ रही हैं " दिव्या ने गर्दन घुमा कर देखा .. जान कर भी अपने उनाबी कुरते से सफेदी झाड़ने की ज़रूरत महसूस नहीं की.. रुके हुए आंसुओं को रफ़्तार देती हुई तेज़ी से कमरे के भीतर घुस गई...

आजकल वह अक्सर लड़कियों की फोटो लेकर आता है "देखो आंटी यह कैसी लगती है... दीपा तुम बताना ज़रा?" माँ आँख, नाक, रंग, कद का निरिक्षण कर अपनी राय दिया करती और दीदी "अच्छी है..." कह कर किताब पर नज़र गड़ा लेती ... आजकल आईने ने चुगली करनी बंद कर दी है और अब तो उसे भी यकीन हो गया है वह सिर्फ चुगली कर रहा था .. आजकल दीपा दीदी किसी ना किसी बहाने शाम को पड़ोस की आंटी के यहाँ अपनी सहेली से मिलने चली जाती है .. इन दिनों आईने से हट कर दीदी को बालकनी में खड़े देखा है... सामने कोई नया आया है... दिव्या उसे स्कूल जाते हुए रोज़ सुबह मोटर साइकल से जाते हुए देखती है ..उसे अनदेखा करती हुई सामने से निकल जाती है वह शाम को अपनी बालकनी से दीदी को देखता है ...नहीं वो दोनों एक दुसरे को देखते हैं ...
सौरभ मिठाई का डिब्बा लेकर आया है उसने इंजीनियरिंग पास कर ली है और उसकी नौकरी लग गई है... माँ सब्जी लेने गई है, दीदी पड़ौस में, पिता दौरे पर और वह भूल गई थी आज इतवार नहीं है... वो सोच रही थी सौरभ दरवाज़े से ही लौट जाएगा... लेकिन ऐसा नहीं हुआ...
"यह क्या पढ़ रही हो ..." सौरभ ने भीतर घुसते हुए पूछा..
उसने आँखे नीची किये किताब उसके हाथ में थमा दी..
"अच्छा तो तुममे भावनाये हैं... " वह मैला आँचल के पेज पलटते हुए बोला ...किताब मेज पर रख कुर्सी पर बैठते हुए ट्रीग्नोमेट्री की खुली किताब देख कर बोला ..
"चलो तुम्हारी ट्रीग्नोमेट्री टेस्ट करता हूं " फ़टाफ़ट उसने अपने साथ वाली कुर्सी खींच दी..
दिव्या के सर के एंटिना खड़े हो गए ... किन्तु वह एक कबूतर की तरह आँखे बंद किये उसके बगल की कुर्सी पर जा बैठी... सौरभ ने उससे कुछः नहीं पूछा और वह उसकी कापी में लिखे सवालों का हल धर्य और धीरे से उसे समझाने लगा..बीच - बीच में जब भी उससे पूछता "समझ आया ...?" वो आँखे नीची किये सर हिला देती ...
सौरभ की नज़र मेज़ पर पड़े लिफ़ाफ़े पर गई "यह यहाँ रह गया था ...मैं इसे घर में ढूंढ रहा था..." और उसने लिफ़ाफ़े से फोटो निकाल उसके सामने रख दी और पूछा ... " कैसी लगी तुम्हें? "
उसने कुछः क्षण फोटो पर नज़रें टिकाई और धीरे से बोली ... "बहुत सुंदर है..." फोटो में कोई वाकई दीदी से भी ज्यादा सुंदर थी..
" पर तुम्हारे जैसी नहीं है..."
"मतलब? " बोलना चाहती थी लेकिन जीभ तालुओं पर चिपक गई ..पेरों के नीचे की ज़मीन हिलने लगी .. वह एकदम घबरा गई जैसे अपने जीवन का सबसे बड़ा गुनाह करने जा रही हो ...
वो कापी पर लकीरें खींच रहा था, एक घर जैसा आकार बनाने की कोशिश में जुटा था.. पन्ने को दिव्या के सम्मुख कर बोला "तुम्हारे सिवा मैंने इस घर में किसी और की कल्पना भी नहीं की है....मैं तुम्हारे डाक्टर बनने का इंतज़ार करूंगा .. "
दिव्या की मुठ्ठियाँ भींच गई थी, चेहरे पर रक्त की गुलाबी पसीने के साथ चमकने लगी... उसने अपना पूरा जोर लगा गर्दन हलकी सी ऊपर उठाई, आँखों से पलकों के परदे उठा दिव्या ने सौरभ की तरफ देखा ...
"तुमने कभी मुझे आँख उठा कर नहीं देखा और इस पल की प्रतीक्षा में मैं दो वर्ष से तुम्हारे घर आ रहा हूं ... " सौरभ ने दिव्या की आँखों में झांकते हुए कहा ....
वह कापी का पन्ना फाड़ ... उसे अपनी जेब में डालकर, कुर्सी छोड़ खड़ा हो गया...
"मैं चलता हूँ दरवाज़ा बंद कर लो" और जीना उतर गया...

धरकनो की आवाज़ ने उसे बहरा कर दिया, खून रगों में नदी पर टूटे बाँध की तरह दौड़ रहा है वो स्तब्ध है, अवचेतन है, उसकी सोई इन्त्रियाँ अचानक संचार पाकर चेतन हो उठी हैं ... भीतर- बाहर सब जगह उथल-पुथल है ...वह हवा के वेग से आगे उड़ रही है नहीं वह सागर की लहरों पर फिसल रही है नहीं वह धरती में धंस रही है ... यह कैसा स्पंदन है? यह कैसी अनुभूति है? यह कैसा भय है?

आने वाले वर्षों के लिए सौरभ ने दिव्या से कुछः माँगा ... "मेरे लिए पानी लाओ तो एक घूँट पीकर ग्लास थमाना ..." वह सबके सामने स्टील के ग्लास का मुह घुमाता और जहाँ दिव्या के होठों को छु पानी की बूंद चिपकी होती उसपर अपने होंठ लगा धीरे -धीरे उस अमृत को भीतर उड़ेलता ... जिस दिन उसे ग्लास पर चिपकी बूंद नहीं मिलती वह दिव्या से दोबारा पानी मंगाता ..

धीरे-धीरे पलकों के परदे उठ गए ओर उनकी जगह सौरभ की आहट का इंतज़ार दिव्या की आँखों में पसरने लगा...
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